विमल मिश्र
भारतीय रेलवे के लिए अपनी कॉफी टेबल बुक ‘मुंबई लोकल’ लिखने के लिए सिलसिले में मैं वसई-दिवा लाइन के स्टेशनों की खाक छानते हुए खारबाओ पर था कि स्टेशन पर नजर आते एकमात्र इंसान (जो रेल कर्मचारी था) के मुंह यह समझाइश सुनकर दंग रह गया, ‘तेंदुए और जंगली जानवरों से जरा बचके..।’ भरी दोपहरी..शहर में रिहाइश के पास..वह भी स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर इस तरह के खतरे की भला कौन अपेक्षा कर सकता है। ज्यादा दूर नहीं, यह २००८ -२००९ की बात होगी।
अभी भी मैं नेशनल पार्क की बाउंड्री से सटी मुलुंड की जिस बस्ती में रहता हूं, वह तेंदुओं जैसे वनचरों के आतंक से अनजान नहीं है। २०० वर्ष पहले तो पूरा मुंबई अपने २२ पहाड़ों के साथ डोंगरी से मलबार हिल तक २४ किलोमीटर लंबाई और चार किलोमीटर चौड़ाई में पैâला एक विशालकाय घना जंगल ही था। समुद्री तटों पर बिलाव व दरियाई घोड़े और कालबादेवी, मलबार हिल, पायधुनी व भायखला जैसे इलाकों में तेंदुए, बाघ और और लकड़बग्घे निर्भय विचरण किया करते थे। गिरगांव के जंगलों में शाम के बाद जाने से लोग डरते थे। कोलाबा, जो आज अपने पैâशन के लिए जाना जाता है, उन दिनों विशालकाय कछुओं के लिए मशहूर होता था।
परिवर्तन जीवन का नियम है, पर इस उक्ति के हिसाब से भी आज भारत का सबसे अत्याधुनिक हमारा शहर डेढ़ सौ साल पहले के मुंबई से काफी अलग होता था। १८६३ में प्रकाशित गोविंद नारायण मडगावकर की मराठी पुस्तक ‘मुंबई चे वर्णन’ उस दौर में इस शहर की आधुनिक इमारतों, खूबसूरत बंगलों, बगीचों, बंदरगाह की गतिविधियों, कपड़ा मिलों, शिक्षण संस्थानों, धार्मिक स्थलों, अस्पतालों, गलियों-सड़कों, धंधे-व्यापार, दैनंदिन जीवन और विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियों और समुदायों की जीवन शैलियों का दिलचस्प खाका खींचती है। लेखक लिखता है, ‘पता नहीं कितनी भाषाएं और कितनी कौमें मौजूद है, इस शहर में। मराठी की ही ३० या ४० बोलियां मुझे सड़कों पर सुनाई पड़ रही हैं। हिंदुओं के ही १०० या डेढ़ सौ रूप नजर आ रहे हैं। पारसी, मुस्लिम, यहूदी, खोजा, अरब, अफगानी, अंग्रेज, पुर्तगाली, प्रâेंच, डच, तुर्क, जर्मन, आर्मेनियन, चीनी और ऐसे दूसरे हैट पहने हुए लोग सभी दिशाओं में दिखाई पड़ते हैं …।’
शांत और खुली-खुली मुंबई
सौ साल पहले (यानी १९२० के दशक में) मुंबई आज की तुलना में बेहद शांत और खुली जगह थी। पहनावा सादा। सड़कों पर चलने वाले अधिकांश पुरुष धोती-कुर्ता, सूती शर्ट, सिर पर टोपी या पगड़ी पहनते थे, जबकि ब्रिटिश अधिकारी और अमीर पारसी या गुजराती व्यापारी सूट-बूट और हैट में नजर आते थे। मुंबई को ‘रंगों और खूबसूरती से भरी सम्मोहक धरती है’ बताते हुए यहां आए विश्वविख्यात लेखक मार्क ट्वेन ने अपनी किताब Following The Equator : A Journey Around The World में इन सबका वर्णन ‘लोगों से भरे बाजार’, ‘बीन बजाता संपेरा’, ‘आलीशान पर्दों व पारसियों की रंग-बिरंगी पगड़ियों से सजा मलबार पॉइंट (मलबार हिल) का गवर्नर हाउस’, ‘रास्तों पर दौड़ती अंग्रेजों और स्थानीय रईसों की निजी गाड़ियां, जिनके नीचे तीन वर्दीधारी सिपाही बैठे होते थे’ के रूप में किया है। यह वह सुस्त रफ्तार मुंबई थी, जहां लोग भागते नहीं थे, बल्कि जिंदगी को जीते थे, जिसमें अलग ही सुकून और अपनापन था। तब न गगनचुंबी इमारतें होती थीं, न सड़कों पर लकदम कारों के कारवां, न ही लोकल ट्रेनों और बेस्ट की बसों में आज जैसी दम घोटने वाली भीड़। सड़कों के किनारे बड़े-बड़े पेड़ होते थे। शोर-गुल भरे फोर्ट, कोलाबा और मलबार हिल जैसे इलाके बेहद शांत होते थे। लोग शाम को जुहू और गिरगांव चौपाटी पर सिर्फ समुद्र की लहरों की आवाज सुनने और ताजी हवा खाने जाते थे। यह वह जमाना था, जब सड़कें अपने फुटपाथों के साथ सुबह-शाम दो बार बुहारी ही नहीं जाती थीं, धुला भी करती थीं। सुबह-सुबह आरे डेयरी के बूथ से कांच की बोतलों में दूध लाना और उस पर जमी मोटी मलाई को ब्रेड पर लगाकर खाना। दोपहर को नुक्कड़ पर मिलने वाला ‘गोटी सोडा’ (ण्द््-हाम्व् ंदूूत) जिसमें कंचे को उंगली से दबाकर `पॉप’ की आवाज के साथ गैस निकलती थी, हर बच्चे का पसंदीदा ड्रिंक था। शाम को समुद्र किनारे चटपटी भेलपुरी और मलाई कुल्फी के स्वाद के साथ लकड़ी के बक्से पर बर्फ घिसकर, उस पर लाल-हरे रंग का शर्बत और ऊपर से मलाई डालकर मिलने वाला बर्फ का गोला आज की किसी भी महंगी आइसक्रीम से बेहतर था।
१९वीं शताब्दी की शुरुआत तक मुंबई में यात्रा के मुख्य साधन थे रेकला (बैलगाड़ी), शिकरम, इक्का (घोड़ागाड़ी) और पालकी। कोलाबा, अपोलो बंदर, बीएमसी, पोर्चुगीज चर्च और लालबाग सहित २५ स्थानों पर इन गाड़ियों के स्टैंड होते थे। बैलगाड़ियां सामानों के लिए रिजर्व होती थीं। एक किलोमीटर यात्रा के लिए बैलगाड़ी का भाड़ा होता था तीन आना और घोड़ागाड़ी का चार आना। हाथगाड़ियों का चलन सबसे आखिर में हुआ। १८१९ में ‘बॉम्बे कुरियर’ ने फोर्ट से सायन तक हॉर्स कोच सर्विस चलाने की घोषणा की। १८५३ में ट्रेनों का युग शुरू हुआ, १८७४ में अश्वचालित ट्रामों का और ‘विक्टोरिया’ का जमाना आया १८९२ में। १९०१ में जमशेदजी टाटा पहले भारतीय बने, जिनके पास अपनी कार थी। बिजली की ट्रामों ने घोड़ा चालित वाहनों का युग खत्म कर दिया। मोटर टैक्सियों का चलन शुरू हुआ १९११ में और १५ जुलाई, १९२६ को चली बेस्ट की पहली ओमनीबस ने मुंबई के ट्रांसपोर्ट को नए युग में पहुंचा दिया। १९२५-२६ के दौरान ही मुंबई में पहली बार बिजली से चलने वाली ट्रेन और ट्रामें पूरी तरह सक्रिय हुर्इं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
