मैं तो चुप हूं

मैं तो चुप हूं, लेकिन…
मैंने हंसते हुए चेहरों के पीछे गमों को छिपते देखा,
कहते थे वो सब-
“जिंदगी है यारों, कट जाएगी।”
उनकी आंखों को मैंने नम होते देखा,
कहती थीं वो बूंदें-
“जिंदगी है यारों, गुजर जाएगी।”
मैंने लबों पर खामोशी को ठहरे हुए देखा,
फुसफुसाती थी वो-
“जिंदगी है यारों, यूं ही निकल जाएगी।”
मैंने टूटे दिल को संभलते हुए देखा,
कहता था वो-
“जरा जी ले, वरना जिंदगी हाथों से फिसल जाएगी।”
मैंने अंधेरों में अकेले चलना सीखा,
कहीं न कहीं तो मंजिल अपने आप मिल ही जाएगी।
मैंने जीने की जिद को फिर उभरते देखा,
कि राख में भी कुछ रौशनी बच ही जाएगी।
मैंने तो बस इस दुनिया से इतना ही जाना
ये जिंदगी है यारों, क्या यही लेकर जाएगी?
-स्नेहा त्रिपाठी (आरुही)
पुणे

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