मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा :  सब ऑनलाइन, फिर भी अकेले

फलसफा :  सब ऑनलाइन, फिर भी अकेले

सना खान

पिछले हफ्ते मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ एक कैफे में बैठी थी। कई दिनों बाद मिलने का मौका मिला था, इसलिए मुझे लगा कि आज पुरानी बातें होंगी, हंसी-मजाक होगा और कुछ नई यादें बनेंगी। लेकिन कैफे पहुंचते ही मुझे समझ आ गया कि अब मुलाकातों के तौर-तरीके बदल चुके हैं। हम सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे ही थे कि किसी ने कहा, ‘रुको, पहले फोटो लेते हैं, नहीं तो लोग समझेंगे ही नहीं कि हम मिले थे।’ बस फिर क्या था। चाय आने से पहले तस्वीरें आ गर्इं। किसी को अपनी मुस्कान पसंद नहीं आ रही थी, तो कोई बार-बार कैमरे का एंगल बदल रहा था। पांच मिनट की मुलाकात में पच्चीस तस्वीरें खिंच चुकी थीं।
आखिरकार, तस्वीरें सोशल मीडिया पर पहुंचीं और कुछ ही देर में कमेंट आने लगे-‘वाह, क्या शानदार शाम है!’ ‘क्या मस्ती चल रही है!’ दिलचस्प बात यह थी कि जिस शाम को लोग इतना शानदार समझ रहे थे, उसमें हममें से आधे लोग अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त थे। कोई रील्स देख रहा था, कोई स्टोरी अपडेट कर रहा था और कोई यह गिन रहा था कि उसकी पोस्ट पर कितने लाइक्स आए। सच कहूं तो मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा थी। थोड़ी देर बाद मैंने आस-पास देखा। लगभग हर टेबल पर वही नजारा था। लोग साथ बैठे थे, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज्यादा था। अब दोस्तों की पसंद-नापसंद जानने के लिए घंटों साथ बैठने की जरूरत नहीं पड़ती; उनकी प्रोफाइल और स्टेटस ही बहुत कुछ बता देते हैं। तकनीक ने हमारी जिंदगी आसान बनाई है, इसमें कोई शक नहीं। दूर बैठे लोग एक क्लिक में जुड़ जाते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि इस जुड़ाव के बीच कुछ छोटी-छोटी बातें पीछे छूट गई हैं-बिना वजह की हंसी, अचानक शुरू हुई बातचीत और वह सुकून, जो किसी अपने के साथ चुपचाप बैठने में मिलता था। घर लौटते समय मैंने अपना फोन खोला। हमारी तस्वीर पर सैकड़ों लाइक्स आ चुके थे, तभी मुझे एहसास हुआ कि उस शाम की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि हम सबने साथ बिताए समय से ज्यादा समय यह दिखाने में लगा दिया कि हम साथ थे। शायद इसलिए कभी-कभी फोन की स्क्रीन से नजरें हटाकर सामने बैठे लोगों को देख लेना भी जरूरी है, क्योंकि कुछ रिश्ते तस्वीरों से नहीं, बातचीत से खूबसूरत बनते हैं।

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