मुख्यपृष्ठस्तंभगजबे है : अदालत या अखाड़ा?.. इंसाफ से पहले हुई `धुनाई'!

गजबे है : अदालत या अखाड़ा?.. इंसाफ से पहले हुई `धुनाई’!

उमा सिंह

पंचकुला जिला अदालत से आई खबर ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस जगह लोग न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, अगर वहीं हाथापाई, धमकी और कथित बंधक बनाने जैसे आरोप सुनाई दें, तो आम आदमी सोचे भी तो क्या सोचे? आरोप है कि एक सेवारत लेफ्टिनेंट कर्नल के साथ अदालत परिसर में मारपीट हुई, फिर उन्हें कथित तौर पर एक चेंबर में ले जाकर समझौते पर हस्ताक्षर भी करवाए गए। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और सीसीटीवी फुटेज की जांच कर रही है। अब सच अदालत और जांच ही तय करेगी, लेकिन सवाल तो अभी से खड़े हो गए हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अगर एक सेना का अधिकारी, जो देश की सीमाओं पर खड़ा होकर सुरक्षा देता है, अदालत परिसर में खुद को असुरक्षित महसूस करे, तो आम नागरिक का भरोसा किस पर टिके? यह मामला किसी एक पेशे या समुदाय पर टिप्पणी करने का नहीं, बल्कि कानून के राज पर उठते सवालों का है। कुछ लोगों की कथित हरकतों का ठीकरा पूरे वकील समुदाय पर नहीं फोड़ा जा सकता, क्योंकि न्याय व्यवस्था उन्हीं की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी टिकी है।
फिलहाल पुलिस जांच कर रही है, मेडिकल रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल जारी है। उम्मीद यही है कि जो भी तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई हो। क्योंकि अदालत अगर न्याय का मंदिर है, तो वहां डर, दबाव और कथित गुंडागर्दी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। वरना लोगों को पैâसला मिलने से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता ज्यादा सताने लगेगी और लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी चिंता शायद ही कोई हो। कानून का सम्मान तभी बचेगा, जब कानून सब पर समान रूप से लागू होता दिखे।

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