-शेखर सुमन के सहयोगी पर विदेशी मुद्रा मामले में छापा, लेकिन
प्रभु राम के चढ़ावे की लूट में केंद्रीय एजेंसी अब तक गायब
-आरोपियों और पूर्व पदाधिकारियों से बंद कमरे में मुलाकातें,
-क्या जांच से पहले तैयार हो रही बचाव की रणनीति?
नई दिल्ली / अयोध्या
विपक्षी नेताओं, सत्ता के आलोचकों या उनसे जुड़े कारोबारियों के यहां मामूली आर्थिक गड़बड़ी की सूचना मिलते ही प्रवर्तन निदेशालय की सक्रियता दिखाई देने लगती है। लेकिन अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की संगठित चोरी, सुरक्षा व्यवस्था की भारी विफलता और ट्रस्ट के जिम्मेदार पदाधिकारियों पर उठे सवालों के बावजूद ईडी की चुप्पी अब स्वयं एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन गई है।
हाल में ईडी ने अभिनेता और व्यंग्यकार शेखर सुमन से जुड़े कारोबारी तथा फिल्म निर्माता धर्मेश संगानी और उनकी कंपनी के परिसरों पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के तहत छापेमारी की। एजेंसी ने विदेशों में कथित अघोषित खातों, संपत्तियों और निर्यात से प्राप्त धन भारत नहीं लाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। संगानी शेखर सुमन फिल्म अकादमी के सह-संस्थापक भी बताए जाते हैं। छापे को शेखर सुमन के राजनीतिक व्यंग्य कार्यक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी ओर राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण में एसआईटी ने लगभग ४० दिनों में चोरी की दर्जनों घटनाएं, कमजोर सीसीटीवी निगरानी, तलाशी का अभाव और सुरक्षा व्यवस्था के लगभग पूर्ण पतन जैसी गंभीर खामियां दर्ज की हैं। आठ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, लगभग आठ करोड़ रुपए की बरामदगी की खबर है और ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय तथा सदस्य अनिल मिश्रा के इस्तीफे भी स्वीकार किए जा चुके हैं।
सवाल यह है कि करोड़ों श्रद्धालुओं के चढ़ावे की योजनाबद्ध चोरी केवल कुछ कर्मचारियों की जेब काटने का मामला है या इसके पीछे धन के बंटवारे, संरक्षण और बड़े नेटवर्क की भी जांच होनी चाहिए? यदि चोरी का पैसा संपत्तियों, मुखौटा कंपनियों या संदिग्ध लेन-देन में लगाया गया है तो क्या धनशोधन की संभावना की जांच नहीं होनी चाहिए? आज ईडी किसी भी साधारण चोरी के मामले में स्वत: पहुंच जाती है, छापेमारी और दबाव का खेल शुरू हो जाता है।
बंद कमरों में क्या पक रहा है?
चढ़ावा चोरी विवाद के बीच अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन की पूर्व महासचिव चंपत राय से बंद कमरे में लंबी मुलाकात और संघ, विश्व हिंदू परिषद तथा संत प्रतिनिधियों की लगातार आवाजाही ने भी सवाल खड़े किए हैं। मुलाकात करना अपराध नहीं है, लेकिन जांच के दौरान जिम्मेदार पदों पर रहे लोगों और प्रभावशाली संगठनों के बीच गोपनीय चर्चाएं संदेह को जन्म देती हैं। क्या इन बैठकों में जांच को मजबूत करने पर विचार हो रहा है या दोषी लोगों को बचाने की रणनीति तैयार की जा रही है? क्या एसआईटी सभी जिम्मेदार अधिकारियों, ट्रस्टियों और संरक्षण देने वालों से समान कठोरता से पूछताछ करेगी? जनता को इसका स्पष्ट उत्तर मिलना चाहिए।
२२ जुलाई की बैठक पर निगाह
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने इस घटना को शर्मनाक कलंक बताते हुए प्रबंधन व्यवस्था में बड़े सुधार की आवश्यकता स्वीकार की है। ट्रस्ट की अगली अहम बैठक २२ जुलाई को होने वाली है। इस बैठक में अंतिम निर्णय लिया जा सकता है। इसमें प्रशासनिक ढांचे और जिम्मेदारी को लेकर निर्णय होने की संभावना है।
‘राम मंदिर आरएसएस का कार्यालय’
ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने विवाद के बीच तीखा बयान देते हुए मौजूदा व्यवस्था में राम मंदिर को ‘आरएसएस का कार्यालय’ बताया है। इससे पहले उन्होंने चढ़ावा प्रकरण में ट्रस्ट के जिम्मेदार पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करने और प्रमुख आरोपियों को बचाने का आरोप लगाया था।
ईडी की निष्पक्षता की असली परीक्षा
मुद्दा यह नहीं कि धर्मेश संगानी के खिलाफ जांच क्यों हुई। यदि विदेशी खातों और एफईएमए उल्लंघन के प्रमाण हैं तो एजेंसी को निश्चित रूप से कार्रवाई करनी चाहिए। असली प्रश्न यह है कि यही तत्परता सत्ता से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मामलों में क्यों दिखाई नहीं देती? ईडी को विपक्ष की गलियों में दौड़ने वाली राजनीतिक पुलिस की छवि से बाहर निकलना होगा। राम मंदिर चढ़ावा चोरी में यदि धनशोधन, बेनामी संपत्ति या आपराधिक आय के इस्तेमाल के संकेत मिलते हैं तो उसे बिना राजनीतिक अनुमति की प्रतीक्षा किए जांच शुरू करनी चाहिए।
