मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ :  कुर्सी से बड़ा कौन?.. अफसर, सत्ता या लोकतंत्र

तीर-ए-तौसीफ :  कुर्सी से बड़ा कौन?.. अफसर, सत्ता या लोकतंत्र

तौसीफ कुरैशी

लोकतंत्र में राजा बदलते रहते हैं, लेकिन राज चलानेवाले चेहरे कई बार वही रहते हैं। जनता हर पांच साल में अपना पैâसला सुनाती है, मगर सत्ता के गलियारों में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनकी कुर्सी चुनाव से नहीं, विश्वास से चलती है। नेताओं का विश्वास और जब किसी अफसर पर हर सरकार भरोसा करने लगे, तब सवाल केवल उसकी प्रतिभा का नहीं रहता, व्यवस्था के चरित्र का भी हो जाता है।
जनता की अदालत!
नृपेंद्र मिश्रा का नाम भारतीय नौकरशाही में इसी बहस के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति हो या दिल्ली का सत्ता गलियारा, सपा कंपनी की सरकार हो या भाजपा की, उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। यह प्रभाव उनकी प्रशासनिक क्षमता का प्रमाण था या सत्ता की नब्ज पहचान लेने की कला, इस पर मत अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह सच है कि वे हमेशा चर्चा में रहे। उनके जीवन का सबसे सनसनीखेज विवाद तब सामने आया, जब उन पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से कथित संबंधों के आरोप लगे। उस समय देश में तरह-तरह की चर्चाएं हुर्इं और सुरक्षा एजेंसियों के स्तर पर जांच की बात भी सामने आई। लंबे समय तक संदेह का धुआं उठता रहा, लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे उनके विरुद्ध जासूसी का आरोप सिद्ध हो सके। लोकतंत्र में आरोप लगाना आसान है, उन्हें साबित करना कठिन। इसलिए इतिहास आरोप और प्रमाण के बीच का अंतर कभी नहीं भूलता, लेकिन हर विवाद अदालत में नहीं होता। कुछ विवाद जनता की अदालत में चलते हैं। १९९४ का रामपुर तिराहा कांड ऐसा ही एक अध्याय है। उत्तराखंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों पर गोलियां चलीं। कई लोग मारे गए। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगे। पूरा देश स्तब्ध रह गया। उस समय उत्तर प्रदेश के गृह सचिव के रूप में नृपेंद्र मिश्रा प्रशासन की सर्वोच्च जिम्मेदारी निभा रहे थे। इसलिए उनकी भूमिका भी सवालों के घेरे में आई। लोकतंत्र में कभी-कभी गोली चलानेवाला सिपाही नहीं, आदेश देनेवाली व्यवस्था कटघरे में खड़ी होती है। १,६५० करोड़ फर्टिलाइजर स्वैâम के आरोपी उत्तर प्रदेश वैâडर के बेहद ताकतवर, चर्चित और विवादित आईएएस अधिकारी रहे नृपेंद्र मिश्रा (जिन्हें अक्सर बोलचाल में निबेंद्र मिश्रा या नेपेंद्र मिश्रा भी कह दिया जाता है) की कहानी भारतीय प्रशासनिक सेवा के सबसे फिल्मी और उतार-चढ़ाव भरे अध्यायों में से एक है। नृपेंद्र मिश्रा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत शायद यह थी कि वे केवल एक सरकार के अफसर नहीं रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति उनकी निष्ठा अब काम आ रही है। संघ के लिए बहुत कुछ किया ऐसा प्रतीत होता है। मुलायम सिंह यादव के भरोसेमंद भी रहे और बाद में कल्याण सिंह की सरकार में भी उनका प्रभाव बना रहा। हर सरकार में प्रभाव बना रहे ये व्यक्ति की प्रतिभा का कमाल नहीं था या है ये कमाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति समर्पण भाव का था।
लोकतंत्र की असली परीक्षा
राजनीति में जहां दोस्ती और दुश्मनी हर चुनाव के साथ बदल जाती है, वहां किसी अफसर का हर सत्ता के केंद्र में बने रहना अपने आप में अध्ययन का विषय है। दिल्ली पहुंचे तो दूरसंचार सचिव बने, फिर ट्राई के अध्यक्ष। बाद के वर्षों में जब दूरसंचार नीतियों और २जी स्पेक्ट्रम विवाद पर देश में बड़ी बहस छिड़ी, तब उनके पैâसलों और भूमिका पर भी सवाल उठे। उनसे पूछताछ हुई, लेकिन उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार का कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ। फिर भी सत्ता के गलियारों में नाम जितना बड़ा होता है, उसके साथ विवादों की परछाई भी उतनी ही लंबी चलती है। साल २०१४ में उनकी कहानी ने नया मोड़ लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना प्रधान सचिव बनाना चाहा। लेकिन ट्राई कानून में मौजूद प्रावधान रास्ते में खड़े थे। तब सरकार ने कानून में संशोधन का रास्ता चुना। विपक्ष ने कहा कि एक व्यक्ति के लिए कानून बदला गया। सरकार ने कहा कि देश को उनकी सेवाओं की जरूरत थी। सवाल आज भी वही है क्या कानून व्यक्ति के लिए बदलना चाहिए या व्यक्ति कानून के अनुसार चलना चाहिए? यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है। संस्थाएं इसलिए बनती हैं कि वे व्यक्ति से बड़ी रहें। यदि किसी एक व्यक्ति की नियुक्ति के लिए कानून बदलना पड़े तो बहस केवल उस व्यक्ति की योग्यता पर नहीं, संस्थाओं की मजबूती पर भी होनी चाहिए। नृपेंद्र मिश्रा की पूरी यात्रा हमें यही सोचने पर मजबूर करती है कि लोकतंत्र में सबसे ताकतवर कौन होता है चुना हुआ नेता, नियुक्ति वाला अफसर या वह व्यवस्था जो दोनों को जवाबदेह बनाती है? यदि व्यवस्था कमजोर हो जाए तो अफसर भी शक्तिशाली दिखने लगते हैं और नेता भी अजेय।
जनता का विश्वास
लोकतंत्र केवल संविधान की किताब में नहीं रहता, वह जनता के विश्वास में रहता है। विश्वास तब बनता है जब सत्ता से बड़ा नियम हो, व्यक्ति से बड़ी संस्था हो और पद से बड़ा उत्तरदायित्व। किसी भी अधिकारी का मूल्यांकन उसकी ताकत से नहीं, उसकी जवाबदेही से होना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी कुर्सी किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधान सचिव की नहीं होती सबसे बड़ी कुर्सी जनता की होती है। वही अंतिम मालिक है, वही अंतिम न्यायाधीश है इससे इंकार नही कर सकते है लेकिन अब लगता है कि उसका भय खत्म हो गया है क्योंकि उसने अपने चुनाव का तरीक़ा बदल लिया है, अब वह वोटिंग मुद्दों पर आधारित नही करती, भावनाओ में बह कर करती है उसके नतीजे ऐसे ही आते हैं। जो हो रहा है, ऐसा ही होता है।
सत्यमेव जयते

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