मुख्यपृष्ठधर्म विशेषनमस्तस्यै नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमो नम:

नमस्तस्यै नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमो नम:

शीतल अवस्थी

शक्ति की परम कृपा प्राप्त करने हेतु संपूर्ण हिंदुस्थान में नवरात्रि का पर्व बड़े श्रद्धा, भक्ति, हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। नौ दिनों तक विशेष सफाई तथा पवित्रता को महत्व देते हुए नौ देवियों की आराधना करते हुए हवनादि यज्ञ क्रियाएं करते हैं। नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएं अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
संपूर्ण ब्रह्मांड सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी, पेड़-पौधें, पर्वत, सागर, पशु-पक्षी, देव, दनुज, मनुज, नाग, किंन्नर, गधर्व, सदैव प्राण शक्ति व रक्षा शक्ति की इच्छा से चलायमान हैं। मानव सभ्यता का उदय भी शक्ति की इच्छा से हुआ। उसे कहीं न कहीं प्राण व रक्षा शक्ति के अस्तित्व का एहसास होता रहा है। जब महिषासुरादि दैत्यों के अत्याचार से भू व देव लोक व्याकुल हो उठे तो परमपिता परमेश्वर ने आदिशक्ति मां जगदंबा को विश्व कल्याण के लिए प्रेरित किया। जिन्होंने महिषासुरादि दैत्यों का वध कर भू व देव लोक में पुनः प्राण शक्ति व रक्षा शक्ति का संचार कर दिया। बिना शक्ति की इच्छा एक कण भी नहीं हिल सकता। त्रैलोक्य दृष्टा शिव भी (इ की मात्रा, शक्ति) के हटते ही शव (मुर्दा) बन जाते हैं। अर्थात देवी भागवत, सूर्य पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, मार्कंडेय आदि पुराणों में शिव व शक्ति की कल्याणकारी कथाओं का अद्वितीय वर्णन है।
नवरात्रि में व्रत का विधान भी है जिसमें पहले, अंतिम और पूरे नौ दिनों तक का व्रत रखा जा सकता है। इस पर्व में सभी स्वस्थ व्यक्तियों को समर्थ व श्रद्धा अनुसार व्रत रखना चाहिए। किंतु जो बीमार व रोगी हो उन्हें व्रत रखना जरूरी नहीं है। किंतु मां भगवती का गुणगान कर या करवा, सुन या सुनाकर रोग व पीड़ाओं से मुक्त हो सकते हैं। व्रत में शुद्ध शाकाहारी व शुद्ध व्यंजनों का ही प्रयोग करना चाहिए। सर्वसाधारण व्रती व्यक्तियों को प्याज, लहसुन आदि तामसिक व मांसाहारी पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए। व्रत में फलाहार अति उत्तम तथा श्रेष्ठ माना गया है किंतु कुछ लोग स्थानीय रीतियों व अन्य कारणों से नमकीनयुक्त पदार्थों के उपयोग के साथ ही सायंकाल में अन्नादि का प्रयोग करते हैं जो ठीक हो सकता है। किंतु उत्तम नहीं।
पूजा के समय ज्योति जो साक्षात् शक्ति का प्रतिरूप है उसे अखंड ज्योति के रूप में शुद्ध देशी घी या गाय घी हो तो सर्वोत्तम है प्रज्ज्वलित करना चाहिए। इस अखंड ज्योति को सर्वतोभद्र मंडल के अग्नि कोण में स्थापित करना चाहिए। ज्योति द्वारा ही प्रत्येक जीवन को प्राण शक्ति प्राप्त होती है, इस ज्योति से ही आर्थिक समृद्धि के द्वार खुलते हैं। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी का पूजन होता है।
नवरात्रि पर्व के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। मां ब्रह्मचारिणी समस्तविद्याओं मी ज्ञाता मानी जाती हैं। मां ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बाएं हाथ में कमंडल लिए हुए सुशोभित हैं। इस दिन साधक कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए भी साधना करते हैं। जिससे उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें। मां दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंतफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।
या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ: हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अंबे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं।
उपासना मंत्र-
दधाना कपाद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू । देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
महत्वपूर्ण रंग- हल्का पीला (आम्ररंग)
नैवेद्य-शक्कर

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