के.पी. मलिक
भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का संबंध केवल एक राजनीतिक दल और वैचारिक संगठन का नहीं माना जाता, बल्कि इसे दशकों से संगठन, विचार और कार्यकर्ता-आधारित राजनीति के एक मॉडल के रूप में देखा जाता रहा है। यही कारण है कि जब भी दोनों के संबंधों में मतभेद, दूरी या असहजता की चर्चा होती है, वह केवल राजनीतिक गपशप नहीं रह जाती, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए गंभीर विश्लेषण का विषय बन जाती है।
हाल के समय में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों ने दावा किया है कि भाजपा और संघ के बीच अंदरूनी मतभेद पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। उनके मुताबिक, यह मतभेद किसी एक घटना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि टिकट वितरण, संगठनात्मक निर्णय, नेतृत्व शैली और पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका जैसे अनेक मुद्दों पर असंतोष की परतें मौजूद हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और भाजपा तथा आरएसएस सार्वजनिक रूप से अपने संबंधों को मजबूत बताते रहे हैं।
एक प्रतीक या अपवाद?
मध्य प्रदेश की राजनीति में नरोत्तम मिश्रा का नाम लंबे समय से संगठन और सरकार दोनों में प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता रहा है। उनके संदर्भ में उठी चर्चाओं को कुछ विश्लेषक इस रूप में देखते हैं कि पार्टी में वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका को लेकर बहस चल रही है। हालांकि, यह निष्कर्ष निकालना कि कोई एक मामला व्यापक संगठनात्मक संकट का प्रमाण है, जल्दबाजी होगी। राजनीतिक दलों में टिकट वितरण, नेतृत्व परिवर्तन और पीढ़ीगत बदलाव सामान्य प्रक्रियाएं भी होती हैं। फिर भी यदि ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती है और लगातार वरिष्ठ नेताओं के असंतोष की खबरें सामने आती हैं तो संगठनात्मक संस्कृति पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
संगठन की बदलती भूमिका
भाजपा का विस्तार पिछले एक दशक में अभूतपूर्व रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत चुनावी सफलता के साथ पार्टी का स्वरूप भी बदला है। पहले जहां संगठन का आधार मुख्यत: वैचारिक कार्यकर्ता थे, वहीं अब विभिन्न दलों से आए नेताओं, क्षेत्रीय प्रभावशाली चेहरों और चुनावी रणनीति विशेषज्ञों की भूमिका भी बढ़ी है। यहीं से एक स्वाभाविक चुनौती पैदा होती है कि क्या पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं और नए राजनीतिक नेतृत्व के बीच संतुलन बना हुआ है? कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बड़े होते संगठन में यह तनाव असामान्य नहीं होता। दूसरी ओर, आलोचकों का तर्क है कि यदि समर्पित वैâडर स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे तो उसका असर संगठन की दीर्घकालिक ऊर्जा पर पड़ सकता है।
क्या यह वैचारिक मतभेद है?
भाजपा और संघ के संबंधों को लेकर समय-समय पर अलग-अलग मुद्दों पर मतभेदों की चर्चा होती रही है। आर्थिक नीतियां, उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक प्राथमिकताएं या कुछ सामाजिक मुद्दे, इन पर अलग दृष्टिकोण सामने आने की खबरें पहले भी आती रही हैं। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि दोनों संगठनों ने अधिकांश मामलों में सार्वजनिक टकराव से बचते हुए संवाद के माध्यम से मतभेदों को सुलझाने की कोशिश की है इसलिए हर मतभेद को रिश्तों के टूटने का संकेत मान लेना उचित नहीं होगा।
बदलती राजनीतिक संस्कृति
भारतीय राजनीति अब पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यक्तित्व-केंद्रित होती जा रही है। चुनावों में नेतृत्व का चेहरा, डिजिटल प्रचार, संसाधनों का केंद्रीकरण और चुनावी प्रबंधन की भूमिका बढ़ी है। इसका असर लगभग सभी बड़े दलों पर पड़ा है। ऐसी स्थिति में वैचारिक संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व के बीच प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई देना असामान्य नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या यह अंतर संस्थागत संवाद से सुलझाया जा रहा है या भीतर ही भीतर असंतोष का कारण बन रहा है।
वैâसे रखे हुए है नजर?
यदि भाजपा और आरएसएस के बीच किसी प्रकार की दूरी वास्तव में बढ़ती है तो इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश विपक्ष अवश्य करेगा। दूसरी ओर, यदि दोनों संगठन अपने मतभेदों का समाधान कर लेते हैं तो यह मुद्दा केवल राजनीतिक अटकल बनकर रह जाएगा। इसलिए इस विषय का मूल्यांकन दावों के बजाय ठोस घटनाओं, आधिकारिक बयानों और संगठनात्मक पैâसलों के आधार पर किया जाना चाहिए।
संकेतों को पढ़ना जरूरी
बहरहाल, यह कहना कि भाजपा और संघ के बीच ‘ज्वालामुखी फूटने वाला है’, फिलहाल एक राजनीतिक आकलन हो सकता है, लेकिन स्थापित तथ्य नहीं। परंतु मध्य प्रदेश के नरोत्तम मिश्रा प्रकरण में यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि किसी भी बड़े संगठन में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, टिकट वितरण पर असंतोष, नेतृत्व शैली पर सवाल और संवाद की कमी जैसी बातें समय रहते संबोधित न हों तो वे भविष्य में बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी दल की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसका शीर्ष नेतृत्व नहीं, बल्कि उसका संगठन और कार्यकर्ता आधार होता है। यदि दोनों के बीच विश्वास और संवाद मजबूत रहता है तो मतभेद भी शक्ति बन सकते हैं। लेकिन यदि संवाद कमजोर पड़ता है तो छोटे विवाद भी बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले सकते हैं। भाजपा और संघ के संबंध भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण धुरी हैं इसलिए इन संबंधों का आकलन सिर्फ सनसनीखेज दावों के आधार पर न होकर तथ्यों, आधिकारिक संकेतों और दीर्घकालिक राजनीतिक प्रवृत्तियों के आधार पर होना चाहिए।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
