राजन पारकर
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने मुंबई महानगर क्षेत्र में पिंक ई-रिक्शा के लिए अलग मार्ग तय करने और बैटरी तकनीक सुधारने के निर्देश दिए हैं। सुनने में यह योजना आकर्षक लगती है। लेकिन मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अभी तक न पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन हैं, न स्पष्ट मार्ग, न यातायात का समुचित खाका। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि पहले गाड़ी आई या सड़क? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि महिला सशक्तीकरण के नाम पर इस योजना को तेजी से आगे बढ़ाने के पीछे आनेवाले चुनावों की रणनीति भी छिपी हो सकती है। अगर ई-रिक्शा की रफ्तार ही शहर की ट्रैफिक से हार गई तो क्या महिलाएं रोजगार पाएंगी या केवल फोटो सेशन का हिस्सा बनेंगी? ‘सरकार को लगता है कि गुलाबी रंग चढ़ा देने से हर योजना सफल हो जाती है, लेकिन जनता रंग नहीं, परिणाम देखती है।’
मंत्रालय के बंद कमरों से उठता धुआं…
मंत्रालय की इमारतों में इन दिनों पैâसलों की ऐसी बरसात हो रही है कि जनता को समझ ही नहीं आ रहा, यह विकास का मौसम है या चुनावी मानसून! एक तरफ महिलाओं के लिए गुलाबी ई-रिक्शा का सपना सजाया जा रहा है, दूसरी तरफ हजारों एकड़ जमीन पर अंतर्राष्ट्रीय कृषि बाजार का महल खड़ा करने की घोषणा हो रही है और तीसरी ओर नगरपालिकाओं की संपत्तियों को ‘मुद्रीकरण’ के नाम पर बाजार में उतारने की तैयारी शुरू है।
सूत्रों के अनुसार, इन तीनों पैâसलों के पीछे केवल प्रशासनिक सोच नहीं, बल्कि आगामी राजनीतिक समीकरणों की भी गहरी छाया दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सरकार अब हर विभाग से ऐसा कोई बड़ा पैâसला चाहती है, जिसे चुनावी मंच से उपलब्धि बनाकर पेश किया जा सके।
सरकार कह रही है कि सबकुछ जनता के लिए है, लेकिन सवाल यह है कि जनता के लिए ज्यादा है या सत्ता के लिए?
दापचरी का अंतर्राष्ट्रीय कृषि बाजार…किसान का सपना या बिल्डरों का भविष्य?
दापचरी में प्रâांस के रुंगिस बाजार की तर्ज पर अंतर्राष्ट्रीय कृषि बाजार बनाने की घोषणा निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी है। लेकिन सूत्रों के अनुसार मंत्रालय के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि इतनी बड़ी सरकारी जमीन का भविष्य आखिर किसके हाथों में जाएगा? राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि बाढ़वण बंदर, बुलेट ट्रेन, कोस्टल रोड और अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार- इन सबके बीच जमीन की कीमतें आसमान छू सकती हैं। किसानों को निर्यात, कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक बाजार का सपना दिखाया जा रहा है। लेकिन सवाल यह भी है कि कहीं किसान फिर से अपनी ही जमीन के बाहर खड़ा होकर मजदूर तो नहीं बन जाएगा? इतिहास गवाह है कि विकास की कई परियोजनाएं पहले किसानों के नाम पर शुरू हुर्इं और अंत में रियल एस्टेट के नाम पर समाप्त हुर्इं।
नगरपालिकाओं की संपत्ति का मुद्रीकरण…आत्मनिर्भरता या सरकारी संपत्तियों का नया बाजार?’
सरकार का कहना है कि नगरपालिकाएं अपनी संपत्तियों से आय बढ़ाएंगी। सुनने में यह आर्थिक सुधार लगता है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, कई नगरपालिकाओं के अधिकारियों में इस नीति को लेकर असमंजस है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि पारदर्शिता कमजोर रही तो सार्वजनिक संपत्तियां निजी हितों की सीढ़ी बन सकती हैं। जनता ने नगरपालिकाओं को बाजार चलाने के लिए नहीं, शहर चलाने के लिए चुना है। यदि संपत्तियां लीज पर जाती रहीं और नागरिक सुविधाएं पीछे रह गर्इं, तो आनेवाली पीढ़ियां पूछेंगी कि शहर बचा या केवल उसकी जमीन बिकती रही? तीनों पैâसले देखने में विकासवादी हैं, लेकिन असली परीक्षा घोषणाओं की नहीं, क्रियान्वयन की होगी। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय में कई वरिष्ठ अधिकारी भी मानते हैं कि यदि इन योजनाओं में पारदर्शिता, समयबद्धता और जनहित सर्वोच्च नहीं रहा तो यही पैâसले भविष्य में सरकार के लिए राजनीतिक संकट भी बन सकते हैं। लोकतंत्र में घोषणा करना आसान है, जवाब देना कठिन और सत्ता को हमेशा याद रखना चाहिए। ‘जनता अखबार की सुर्खियां नहीं, अपने जीवन की हकीकत पढ़ती है।’
