मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : लोकतंत्र से मुक्ति देने पर आमादा

तरकश : लोकतंत्र से मुक्ति देने पर आमादा

धनुर्धर

बीजेपी के अश्वमेध का घोड़ा एक बार फिर छोड़ दिया गया है। यह चुनावी यज्ञ नहीं है वैसे। २०२४ के चुनावी यज्ञ में यह घोड़ा पार्टीजनों के अति आत्मविश्वास का शिकार हो गया था। ‘अबकी बार, चार सौ पार’ के नारे को भाई लोगों ने कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया। उन्हें लगा, जब मोदी जी ने कहा है तो कुछ सोचकर ही कहा होगा।
सोच पर भरोसा
गड़बड़ यह हुई कि इस बार पार्टीजन मोदी जी की सोच का सही-सही अंदाज नहीं लगा सके। मोदी जी ने कुछ सोचा जरूर था, लेकिन वह नहीं सोचा था, जो पार्टीजन सोच रहे थे कि उन्होंने सोचा है। मोदी जी तो पार्टीजनों में विश्वास भरना चाहते थे। उन्होंने यह सोचकर चार सौ पार का नारा दिया कि कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रहे। मनोबल ऊंचा हुआ भी, पर यह इतना ऊंचा उठ गया कि कार्यकर्ता पर ही बैठे रह गए। उन्होंने खुद उठने तक की जरूरत नहीं महसूस की। लिहाजा, पार्टी के चुनावी अश्वमेध का घोड़ा आधे रास्ते में ही बेदम होकर लुढ़क गया। पार्टी साधारण बहुमत तक भी नहीं पहुंच सकी।
अनुभव से सबक
खैर, पार्टी ने इस अनुभव से सबक लिया। अब उसकी चुनाव प्रबंधन टीम ने तय कर लिया कि मोदी जी कुछ भी कहें, उनकी बातों को ज्यादा सीरियसली नहीं लेना है। सो, चुनावी भाषणों के दावे जो भी हों, टीम मतदाता सूची और मतदान को ‘दुरुस्त’ रखने के अपने लक्ष्य में पूरे मनोयोग से जुटी रहने लगी। महाराष्ट्र हो, हरियाणा हो या फिर पश्चिम बंगाल ही क्यों न हो, हर अहम मुकाबले में इस टीम ने सुनिश्चित किया कि पार्टी का घोड़ा बीच रास्ते में ही न ठहर जाए। यह कहीं ठहरा भी नहीं। हर चुनाव में इसने अपने लक्ष्य को पार किया। जो जगहें पार्टी के लिए अहम नहीं थीं, वहां इस घोड़े को भेजा ही नहीं गया। वहां कोई जीते या हारे अपनी बला से।
चुनाव से आगे
अब बात चुनावों से आगे चली गई है। सवाल है जीत के लिए या बहुमत के लिए चुनावों पर निर्भरता ही क्यों रखी जाए। मोदी जी कितने आत्मनिर्भर नेता हैं, सब जानते हैं। मतदाताओं पर से निर्भरता खत्म करना उनका पहला टारगेट था। चुनाव आयोग के सौजन्य से चलाए गए एसआईआर अभियान की बदौलत यह लक्ष्य काफी हद तक हासिल कर लिया गया है। मतदाता तो छोड़िए, नागरिक भी आप हैं या नहीं, यह आप नहीं तय कर सकते। कोई सच, कोई दस्तावेज यह तय नहीं कर सकता। तय करेगा तो बीएलओ, वह भी पन्ना प्रमुखों की आंख का इशारा समझते हुए।
हजार साल की योजना
मोदी चुनाव भले ५ साल के लिए जीतते हैं, लक्ष्य कम से कम २५ साल आगे का रखते हैं। याद रखिए कम से कम २५ साल, अधिक से अधिक नहीं। अभी देश उनके कहे मुताबिक, २०४७ तक विकसित राष्ट्र बनने के सपने को ही एडजस्ट कर रहा था कि उन्होंने कह दिया, वे एक हजार साल आगे तक देख रहे हैं। उस समय तक की योजना बना रहे हैं। देश ने मान लिया कि मोदी जी कह रहे हैं तो कुछ सोच कर ही कर रहे होंगे। यह चुनावी सीट गिनती का मामला नहीं है कि उनके दावे पर कोई शक किया जाए।
चुनाव पर निर्भरता नहीं
आगे देखने की इसी आदत के चलते मोदी जी ने पार्टी को यह नया टारगेट दिया कि जीत के लिए या संसद में पार्टी का बहुमत बढ़ाने के लिए चुनाव पर निर्भरता दूर की जानी चाहिए। वैसे भी आने वाला समय एक राष्ट्र, एक चुनाव का है। तो क्या एक बार के चुनाव में पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में पूरे पांच साल लूली-लंगड़ी सरकार चलाई जाएगी? नहीं ना। इसी सोच के तहत पार्टी ने इस बार फिर अश्वमेध का अपना घोड़ा छोड़ा है। घोड़े को जिम्मेदारी यह दी गई है कि तमाम छोटे-छोटे दलों के अतिरिक्त सांसदों को उनकी मूल पार्टी से मुक्त कराकर अपने पाले में ले आया जाए।
निशाने पर पवार
पश्चिम बंगाल में चुनाव से अभी-अभी फारिग हुए विधायक हों या दो साल पहले चुनाव जीते सांसद, सब लाइन लगाकर खड़े हो गए पार्टी छोड़ने के लिए। महाराष्ट्र में भी शिवसेना के कई सांसद रहे निशाने पर। सबको अलग-अलग जगह ठहराया गया इज्जत से। कहीं तो पुरानी पार्टी को ही इनके नाम कर दिया गया। कहीं पहले से बनी पार्टियों का सहारा लिया गया। पर निराश किसी को नहीं होने दिया गया। घोड़ा अब एनसीपी (शरद पवार) और समाजवादी पार्टी के सांसद टटोल रहा है।
दुनिया की सैर पर
बगैर चुनाव के, अल्पमत को दो तिहाई बहुमत में बदलने का यह करिश्मा आनेवाली पीढ़ियां लंबे समय तक याद रखेंगी। चुनाव वैसे भी एक खर्चीला प्रकरण है। और लोकतंत्र एक कष्टप्रद प्रक्रिया है। इसलिए देश को इन दोनों से मुक्त कर सिर्फ बहुमत के बल पर चलाने की तरकीब बड़े काम की है। इसकी बदौलत मोदीजी और भी निश्चिंत होकर दुनिया की सैर पर निकल सकते हैं। बीच-बीच में स्वदेश लौट आने की भी कोई मजबूरी नहीं रहेगी।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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