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अंदर की बात : मुफ्त की साड़ी गई…अब वादों की अलमारी भी खाली?

राजन पारकर

कहावत है कि चुनाव से पहले नेता सपनों की गठरी खोलते हैं और चुनाव के बाद वित्त विभाग हिसाब की फाइल खोल देता है। सूत्रों के अनुसार, आर्थिक तंगी का हवाला देकर अंत्योदय परिवारों को मुफ्त साड़ी देने वाली योजना बंद कर दी गई है। वही योजना जिसे कभी गरीब महिलाओं के सम्मान और हथकरघा उद्योग के उत्थान का प्रतीक बताया गया था। अब सवाल यह है कि यदि खजाना खाली था, तो घोषणा किस भरोसे पर की गई थी? और यदि खजाना आज खाली हुआ है, तो पिछले तीन वर्षों तक सब कुछ ठीक वैâसे चलता रहा? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार अब `लोकप्रिय योजनाओं’ का आर्थिक ऑडिट कर रही है। लेकिन विपक्ष पूछ रहा है कि क्या ऑडिट केवल गरीबों की योजनाओं का होगा या सरकारी तामझाम और प्रचार पर होने वाले खर्च का भी होगा? `जनता को चुनाव में सपने मुफ्त मिले, अब सरकार कह रही है कि साड़ी महंगी पड़ गई!’
सूत्रों का कहना है कि आने वाले महीनों में कुछ और योजनाओं की भी समीक्षा हो सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो चुनावी घोषणाओं और वास्तविक आर्थिक स्थिति के बीच का अंतर और अधिक उजागर होगा।
`वादों की राजनीति, नाराजगी की पटकथा और सत्ता के बंद कमरों की बेचैनी’
महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों तीन अलग-अलग घटनाओं के बहाने एक ही कहानी कहती दिखाई देती है-सरकारी खजाना खाली होने पर योजनाएं बंद हो जाती हैं, सत्ता के करीब रहने वाले नेताओं पर गंभीर आरोप लगते हैं और सहयोगी दलों के भीतर भी असंतोष की फुसफुसाहट तेज हो जाती है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आने वाले दिनों में कई पैâसले केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि चुनावी और राजनीतिक समीकरणों से भी तय होंगे। सत्ता के गलियारों में सवाल यही है-जनता के लिए बनाई गई योजनाएं टिकेंगी या केवल चुनाव तक ही सीमित रहेंगी?

तस्वीर एक…नाराजगी अनेक!
राजनीति में कभी-कभी सबसे बड़ा विवाद किसी भाषण से नहीं, बल्कि एक तस्वीर से भी खड़ा हो जाता है। चर्चा है कि एक विशेष फोटो लगाने और उसका जियो-टैग करने के निर्देशों ने पार्टी के कुछ विधायकों को असहज कर दिया है। सवाल तस्वीर का कम और भरोसे का ज्यादा बताया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि कुछ विधायक यह मान रहे हैं कि उन पर भरोसा कम और निगरानी ज्यादा की जा रही है। यदि यह केवल संगठनात्मक अनुशासन है, तो असंतोष क्यों? और यदि असंतोष है, तो क्या आने वाले समय में इसका असर राजनीतिक समीकरणों पर दिखाई देगा? `जहां नेता अपने कार्यकर्ताओं से ज्यादा तस्वीरों पर भरोसा करने लगें, वहां राजनीति नहीं, फोटो प्रदर्शनी चल रही होती है।’ सूत्रों का दावा है कि सहयोगी दलों के भीतर भी कई नेता अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर नए विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों योजनाओं से ज्यादा समीकरणों, घोषणाओं से ज्यादा नाराजगियों और भाषणों से ज्यादा बंद कमरों की बैठकों से संचालित होती दिखाई दे रही है। आज साड़ी योजना बंद हुई है, कल कोई और योजना बंद हो सकती है। आज किसी नेता पर आरोप हैं, कल किसी और की बारी हो सकती है। आज तस्वीर पर विवाद है, कल टिकट पर होगा। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन जनता का सवाल वही रहता है-वादा चुनाव तक था या जनता के भविष्य तक?

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