मुख्यपृष्ठसमाचारमालाड के खोत डोंगरी में कानून की उड़ाई जा रही धज्जियां

मालाड के खोत डोंगरी में कानून की उड़ाई जा रही धज्जियां

-हाईकोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाकर कंटेनर ऑफिस उखाड़ा

-पुलिस और एसआरए की रहस्यमयी चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल

सामना संवाददाता / मुंबई

मुंबई के मालाड (पूर्व) स्थित खोत डोंगरी पुनर्विकास परियोजना को लेकर विवाद अब गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। न्यायालय द्वारा यथास्थिति बनाए रखने के स्पष्ट आदेश के बावजूद क्लासिक ट्रेजर प्राइवेट लिमिटेड के साइट ऑफिस (कंटेनर) को कथित रूप से जबरन उखाड़कर हटाए जाने का मामला सामने आया है। इस घटना के बाद पुलिस प्रशासन की भूमिका और झुग्गी पुनर्वास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
खोत डोंगरी को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के पुनर्विकास का अधिकार शाह हाउसकॉन द्वारा क्लासिक ट्रेजर प्राइवेट लिमिटेड को सौंपा गया था। हालांकि, बाद में दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। आरोप है कि शाह हाउसकॉन ने एकतरफा तरीके से समझौता समाप्त करने का प्रयास किया, जिसके बाद मामला मुंबई उच्च न्यायालय तक पहुंचा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्थ ने 12 मई 2026 को विवादित स्थल पर दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का स्पष्ट निर्देश दिया था।
कोर्ट के आदेश पर बुलडोजर?
आरोप है कि 18 जून 2026 को अदालत के आदेश की अनदेखी करते हुए एसआरए की कथित कार्रवाई की आड़ में क्लासिक ट्रेजर के साइट ऑफिस को हटाने की कार्रवाई की गई। आरोपों के अनुसार, करीब 30 से 35 अज्ञात लोगों ने कंपनी के सुरक्षा गार्डों के साथ कथित रूप से मारपीट की। इसके बाद जेसीबी की मदद से कंपनी के कंटेनर ऑफिस को उखाड़कर सड़क किनारे फेंक दिया गया। यदि अदालत के आदेश के बावजूद यह कार्रवाई की गई है, तो सवाल उठता है कि आखिर किसके निर्देश पर विवादित स्थल पर यह कार्रवाई की गई और क्या संबंधित अधिकारियों को न्यायालय के आदेश की जानकारी थी?
पुलिस और एसआरए की चुप्पी पर सवाल
पूरे मामले में दिंडोशी पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि घटना के दौरान सुरक्षा गार्डों ने पुलिस के आपातकालीन नंबर पर फोन कर मदद मांगी। पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन आरोप है कि हमलावरों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने के बजाय पुलिस मूकदर्शक बनी रही। कंपनी की ओर से मध्यस्थ के आदेश की प्रति पुलिस को सौंपे जाने के बावजूद, कथित तौर पर एफआईआर दर्ज करने के बजाय पीड़ित पक्ष को दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी गई।
दिंडोशी पुलिस ने अपनी लिखित सफाई में दावा किया है कि कंटेनर ऑफिस एसआरए द्वारा हटाया गया था। वहीं, जब इस कार्रवाई को लेकर एसआरए के अधिकारियों से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने पूरे मामले पर चुप्पी साध ली।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का स्पष्ट आदेश था, तो आखिर कंटेनर ऑफिस किसके आदेश पर हटाया गया? क्या संबंधित अधिकारियों को अदालत के आदेश की जानकारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर उसकी अनदेखी की गई? इस पूरे मामले में पुलिस और एसआरए की चुप्पी ने संदेह को और गहरा कर दिया है।

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