देश का विश्वास

भारत मां की पीर का, किसको है अब ख्याल।
देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥
सत्ता इनके हाथ से, फिसली जिस दिन आज।
मिलकर फिर से ढूंढते, छल-कपटों का राज।
धरना, नारे, शोर से, करते रोज बवाल—
भारत मां को हो रहा, इसका बहुत मलाल।
देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥
धरना देकर ढूंढते, फिर सत्ता की राह।
जनता से ज्यादा उन्हें, कुर्सी की है चाह॥
जनता देखे मौन हो, कैसा यह जंजाल—
भारत मां को हो रहा, इसका बहुत मलाल।
देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥
लिए विदेशी धन सदा, करते जो अभियान।
उनसे पूछे देश अब, क्या यह है सम्मान?
हर जनमन के सामने, खड़ा यही सवाल—
भारत मां को हो रहा, इसका बहुत मलाल।
देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥
भारत होगा एक दिन, फिर से अति खुशहाल।
सद्भावों की जल उठे, घर-घर नई मशाल।
देश बड़ा हर धर्म से, ऊंचा इसका भाल—
स्वार्थ नहीं, सद्भाव से, मिलते हैं सुरताल॥
-डॉ. प्रियंका सौरभ

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