सामना संवाददाता / सतना
प्रेमचंद जयंती पखवाड़ा के अंतर्गत प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) इकाई, नागौद द्वारा प्रतिष्ठित अखंड ज्योति विद्यालय में 26 जुलाई को भीगते दिनमान के दौरान एक विचारोत्तेजक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर साहित्यकारों एवं चिंतकों ने प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता, सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों पर गहरी चर्चा की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री सम्मान प्राप्त बाबूलाल दाहिया रहे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार रामलाल सिंह परिहार ने की, जबकि प्रलेस सतना इकाई के महासचिव पत्रकार-कवि-लेखक विजयशंकर चतुर्वेदी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का निर्बाध संचालन इकाई के अध्यक्ष एडवोकेट रमाकांत मिश्र ने किया।
मुख्य अतिथि श्री दाहिया ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्रेमचंद ने अपेक्षाकृत अल्प जीवन में, आश्चर्यजनक ढंग से जो विराट साहित्य-संपदा रची, वह हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता उनका गहन जीवन-संदेश है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि प्रेमचंद की रचनाएँ भारतीय समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक यथार्थ का जीवंत दस्तावेज हैं। सहज भाषा, जीवन से जुड़े पात्र, गहरी मानवीय संवेदना उनकी कृतियों को कालजयी बनाती है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में रामलाल सिंह परिहार ने संक्षेप में बताया कि प्रेमचंद को समझने के लिए उनके साहित्य को जीवनानुभवों के साथ जोड़कर पढ़ना आवश्यक है। विशिष्ट अतिथि विजयशंकर चतुर्वेदी ने विस्तार से बताया कि प्रेमचंद भारतीय जनजीवन के सबसे ज़रूरी और विश्वसनीय कथाकार क्यों हैं। उन्होंने किसान, स्त्री, श्रमिक और समाज के उपेक्षित वर्गों के उस संघर्ष को चित्रित किया जो आज भी जारी है। चतुर्वेदी ने प्रेमचंद के प्रसिद्ध आशय ‘साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के आगे मशाल लेकर चलना है’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह आज भी साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत है।
कालिका त्रिपाठी ने अपनी कविता के माध्यम से प्रेमचंद को श्रद्धासुमन अर्पित किए। वरिष्ठ कवि राजेंद्र सिंह परमार राजन ने अपनी कविता में जतलाया कि प्रेमचंद के लेखन से प्रेरणा लेकर साहित्य और समाज को ज़मीनी कदम उठाने चाहिए, तभी वास्तविक परिवर्तन होगा। कोषाध्यक्ष रामहित त्रिपाठी ने सारगर्भित ढंग से बताया कि प्रेमचंद की रचनाएँ मनुष्य के भीतर मानवीय मूल्यों को जागृत करती हैं और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराती हैं।
बालेंदु प्रभाकर मिश्र ने अपनी काव्य पंक्तियों से स्पष्ट किया कि प्रेमचंद महज कथाकार नहीं, सामाजिक चेतना के अग्रदूत थे। शिक्षक अरुण पयासी ने वक्तव्य दिया कि प्रेमचंद ने साहित्य को कल्पना के दायरे से निकालकर सामाजिक यथार्थ का दर्पण बनाया। पी.के. अहिरवार की राय में प्रेमचंद का साहित्य केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि जीवन में आत्मसात किए जाने योग्य मूल्य-परंपरा है।
इस अवसर पर व्यंग्यकार के. दाहिया, पुष्पेंद्र पाठक, सीताशरण परासर तथा जिला इकाई के मीडिया प्रभारी अनुपम दाहिया भी उपस्थित रहे। नागौद इकाई के महासचिव पुष्कर शरण सिंह ने आभार व्यक्त किया।
