-फिर शिकायत के बजाय सोशल मीडिया पोस्ट क्यों?
-पिता को भी नहीं थी जानकारी
इस प्रकरण का सबसे चौंकानेवाला पहलू यह है कि पूर्व भाजपा विधायक विक्रम सिंह ने मीडिया से कहा कि उन्हें घटना की जानकारी नहीं है और उनकी पत्नी इस बारे में अधिक बता सकती हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, पिता को कथित घटना की जानकारी न होना भी कई प्रश्न पैदा करता है। क्या बेटी ने इतनी गंभीर घटना के बारे में अपने पिता को भी नहीं बताया? राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक संपर्क रखने वाले पिता से तत्काल कानूनी सहायता क्यों नहीं मांगी गई? यदि परिवार को जानकारी थी तो पुलिस शिकायत दर्ज कराने के बजाय मामला सोशल मीडिया तक ही सीमित क्यों रखा गया? पिता का अनभिज्ञ होना आरोप को गलत साबित नहीं करता, लेकिन घटना की समयरेखा को अस्पष्ट जरूर बनाता है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि घटना के बाद यशस्विनी ने सबसे पहले किसे बताया, कब बताया और क्या कार्रवाई मांगी।
-मोदी-विरोधी मंच पर पूर्व भाजपा विधायक की बेटी से कथित छेड़छाड़, चार दिन की चुप्पी पर उठे सवाल
यशस्विनी का आरोप है कि २४ जुलाई को प्रदर्शन स्थल पर भीड़ और बैरिकेड गिरने से बनी अव्यवस्था के बीच एक व्यक्ति ने उन्हें आपत्तिजनक ढंग से छूने की कोशिश की। उन्होंने आरोपी को तीन थप्पड़ मारने तथा वॉलंटियर्स द्वारा मामले को गंभीरता से नहीं लेने का दावा किया है।
पिता का अनभिज्ञ होना आरोप को गलत साबित नहीं करता, लेकिन घटना की समयरेखा को अस्पष्ट जरूर बनाता है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि घटना के बाद यशस्विनी ने सबसे पहले किसे बताया, कब बताया और क्या कार्रवाई मांगी।
-नई दिल्ली
जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के पूर्व भाजपा विधायक विक्रम सिंह की बेटी यशस्विनी राजे सिंह के साथ कथित छेड़छाड़ का मामला सामने आने के बाद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यशस्विनी का आरोप है कि २४ जुलाई को प्रदर्शन स्थल पर भीड़ और बैरिकेड गिरने से बनी अव्यवस्था के बीच एक व्यक्ति ने उन्हें आपत्तिजनक ढंग से छूने की कोशिश की। उन्होंने आरोपी को तीन थप्पड़ मारने तथा वॉलंटियर्स द्वारा मामले को गंभीरता से नहीं लेने का दावा किया है। ऐसे में सबसे अहम सवाल यह है कि भाजपा से जुड़े प्रभावशाली राजनीतिक परिवार की बेटी मोदी सरकार के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन में किस हैसियत से पहुंची थीं? क्या वह परीक्षार्थियों की मांगों के समर्थन में व्यक्तिगत रूप से शामिल हुई थीं, किसी संगठन की प्रतिनिधि थीं या फिर आंदोलन में किसी व्यवधान पहुंचाने की नीयत से गई थीं? नेटिजंस का यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पोस्ट में उनकी मौजूदगी की परिस्थितियों और आंदोलन से जुड़ाव को लेकर विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है।
घटना गंभीर थी तो तत्काल शिकायत क्यों नहीं?
यशस्विनी के अनुसार, किसी व्यक्ति ने केवल धक्का-मुक्की नहीं की, बल्कि बेहद आपत्तिजनक हरकत का प्रयास किया। ऐसा आरोप गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। तब सबसे बड़ा सवाल है कि घटना के तुरंत बाद वहां मौजूद दिल्ली पुलिस को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई? उस वक्त जंतर-मंतर देश के सर्वाधिक पुलिस निगरानी वाले स्थलों में शामिल था। आंदोलन के दौरान पुलिसकर्मियों, बैरिकेडिंग और वीडियोग्राफी की व्यवस्था होने की खबरें लगातार आती रही हैं। ऐसे में आरोपी को पकड़वाने, उसकी पहचान कराने और सीसीटीवी अथवा पुलिस वीडियो सुरक्षित करवाने का तत्काल प्रयास क्यों नहीं हुआ? चार दिन बाद सोशल मीडिया पर आरोप सार्वजनिक करने की जरूरत क्यों पड़ी? फिर क्यों न इसे आंदोलन को बदनाम करने की साजिश माना जाए? यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो उपलब्ध हैं, जिसमें कई लड़कियां वहां पर मौजूद भीड़ को काफी प्रोटेक्टिव, केयरिंग और सिविलाइज्ड बता रही थीं। इस मामले में देरी का कारण स्पष्ट करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि घटनास्थल पर पुलिस, वॉलंटियर, अन्य प्रदर्शनकारी और संभवत: अनेक कैमरे मौजूद थे।
कौन थे वे वॉलंटियर?
यशस्विनी ने आरोप लगाया कि एक पुरुष वालंटियर ने उलटे उन्हीं को डांटना शुरू कर दिया, जबकि दूसरे ने कथित तौर पर कहा कि ऐसी गलतियां होती रहती हैं। यह अपने आप में कहानी के काल्पनिक होने का संकेत देता है। अब बोलें तो ऐसा कोई करता नहीं और यदि कोई करता भी है तो उसके समर्थन में कोई व्यक्ति खड़ा नहीं रह सकता, चाहे भीड़ कितनी ही जुनून में क्यों न हो, उस पर यदि यह दावा सही भी है तो उन वॉलंटियर्स के नाम, तस्वीरें, संगठन और पहचान सार्वजनिक की जानी चाहिए। आखिर वे किस संगठन के वॉलंटियर थे? किसने उन्हें तैनात किया था? क्या उन्होंने आरोपी को भगाया, बचाया अथवा केवल शिकायत को दबाने का प्रयास किया? वहां मौजूद अन्य लोगों में से किसी को गवाह बनाया गया या नहीं? प्रदर्शन के आयोजकों से औपचारिक शिकायत क्यों नहीं की गई? क्या वे भी अांदोलन को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा तो नहीं थे? बिना नाम और पहचान के पूरे आंदोलन या सभी वालंटियर्स को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।
-आरोपी की तस्वीर या वीडियो क्यों नहीं?
आज लगभग हर व्यक्ति के हाथ में कैमरे वाला मोबाइल है। यशस्विनी के अनुसार, उन्होंने आरोपी को तीन थप्पड़ मारे। इसका अर्थ है कि आरोपी कुछ समय तक उनके सामने मौजूद रहा होगा। तब क्या उनकी बहन, आसपास मौजूद किसी प्रदर्शनकारी या किसी अन्य ने उसकी तस्वीर अथवा वीडियो क्यों नहीं बनाया? थप्पड़ मारने के सबूत ही कमरे में कैद कर लिए जाते। क्या आरोपी का हुलिया, कपड़े, उम्र, कद या अन्य पहचान पुलिस को दी गई? क्या सोशल मीडिया पोस्ट में उसकी पहचान बताने का प्रयास हुआ? यदि प्रदर्शन की वीडियोग्राफी हुई थी तो दिल्ली पुलिस से फुटेज जांचने की मांग क्यों नहीं की गई?
-जांच हो, मगर आंदोलन को बदनाम करने का हथियार न बने
यशस्विनी राजे सिंह के आरोपों को केवल उनकी राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण खारिज नहीं किया जा सकता। महिला की शिकायत चाहे सत्ता समर्थक खेमे से आए या विरोधी खेमे से, उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दिल्ली पुलिस को उपलब्ध वैâमरों, वीडियो रिकॉर्डिंग, प्रत्यक्षदर्शियों और वॉलंटियर्स की पहचान के आधार पर सच सामने लाना चाहिए। साथ ही, बिना एफआईआर, आरोपी की पहचान और स्वतंत्र गवाहों के पूरे छात्र आंदोलन को महिलाओं के लिए असुरक्षित घोषित करने की कोशिश भी उचित नहीं होगी। गंभीर आरोप केवल सोशल मीडिया सनसनी बनकर नहीं जाना चाहिए। या तो शिकायत दर्ज हो, आरोपी की पहचान हो और कार्रवाई की जाए, या फिर उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया जाए जिनके कारण चार दिन तक पुलिस और परिवार को अंधेरे में रखा गया।
-इन सवालों के जवाब जरूरी
-घटना के तुरंत बाद दिल्ली पुलिस से शिकायत क्यों नहीं की गई?
-पोस्ट कई दिन बाद ही क्यों लिखी गई?
-आरोपी का हुलिया, तस्वीर या वीडियो कहां है?
-कथित रूप से शिकायत दबाने वाले वॉलंटियर्स कौन थे?
-आयोजकों को लिखित या मौखिक शिकायत दी गई थी या नहीं?
-यशस्विनी के साथ मौजूद उनकी बहन ने क्या देखा?
-क्या प्रदर्शन स्थल की पुलिस या सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित करने की मांग हुई?
-पूर्व विधायक पिता को घटना की जानकारी क्यों नहीं थी?
-क्या अब पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई जाएगी?
-क्या आंदोलनकारी छात्रों को घेरने के लिए प्राइवेट एफआईआर का आधार बनाया जा रहा है।
