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उड़न छू: जेन-जी और पत्रकारिता

अजय भट्टाचार्य

जेन-जेड ने कथित मुख्यधारा के मीडिया को आईना दिखाया है। वही पीढ़ी, जिसे सब अज्ञानी समझते हैं, मोबाइल फोन में सिर गड़ाए, रील में डूबे, अनुभवहीन। इस पीढ़ी ने किसी पर आंख बंद करके भरोसा करना बंद कर दिया है। अपने पैâसले खुद लेती है। पैâसले गलत या सही, यह इतिहास तय करेगा। लेकिन इस पीढ़ी ने अपना दिमाग गिरवी नहीं रखा है। लोकतंत्र में ऐसे आंदोलन होते रहेंगे। लेकिन इस पीढ़ी ने मुख्यधारा की मीडिया से कह दिया कि हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। हम खुद दुनिया के सामने अपनी बात रखेंगे। यह भारतीय मीडिया की प्रेस्टीट्यूट से गोदी मीडिया तक की यात्रा का सबब है।
इस पीढ़ी के बच्चों ने अपने मोबाइल फोन निकाले और खुद पत्रकारिता करने लगे। परिणाम सभी ने देखा कि पांच इंच स्क्रीन वाले मोबाइल फोन से हुई रिपोर्टिंग ने वह सब दिखा दिया जो गोदी मीडिया से अक्सर गायब ही रहता है। एक जवान आदमी को एक सिपाही पैर में लात मारते दिखाने से लेकर एक पुलिसवाले द्वारा लड़की की पीठ में डंडा मारने और गुदा मार्ग में डंडा घुसेड़ने तक सब दिखा दिया। एक वीडियो में एक पुलिसवाला खुद एक कार का शीशा तोड़ता दिख रहा है। अगर यह वैâमरे में वैâद न होता, तो यह तोड़फोड़ ऐसे पैâलाई जाती जैसे छात्रों ने की हो। एक छोटा-सा मोबाइल वैâमरा जब सारे झूठे कथानक को चुनौती देता है तो वही पत्रकारिता बन जाता है। स्टूडियो में बैठकर चिल्ल-पों करना पत्रकारिता नहीं है। पत्रकारिता सच को एकदम सही दृश्य वैâद करने में है, जिसे सत्ता में बैठे लोग छिपाना चाहते हैं। पत्रकारिता वह दस्तावेज एवं घटनाक्रम को उजागर करने में है, जिसे सरकार छिपाना और इतिहास के पन्नों से मिटाना चाहती है। जंतर-मंतर पर बच्चों ने पत्रकारिता वैâसे और किससे सीखी?
अगर देश में मीडिया सच में स्वायत्त और स्वतंत्र होता, तो इन बच्चों को खुद रिपोर्टिंग नहीं करनी पड़ती। नोएडा मीडिया मंडी को अब रिपोर्टर नहीं, ऐसे लोग चाहिए जो पहले से तैयार रखी इबारत को रटकर बोल सकें। ऐसे लोग जो मालिक का चेहरा देखकर सवाल पूछने से पहले इजाजत लें। इसीलिए लोगों का मीडिया पर से भरोसा उठ गया है। खबर पहले मोबाइल फोन पर आती है, फिर चैनलों पर। कोई जागरूक नागरिक सच को वैâमरे में वैâद करता है, फिर टीवी पर गरमागरम बहस होती है। जब लोग खुद वैâमरा संभालते हैं, सूचना-समाचार पर पत्रकारिता का एकाधिकार खत्म हो जाता है। जब चैनल पर खबर दबा दी जाती है, तब जनता अपने मोबाइल वैâमरे से जो दिखाये वही खबर बनती है। जेन-जेड ने मुख्यधारा की पत्रकारिता को उसकी योग्यता और उपयोगिता दिखाई। इसने साबित कर दिया कि पत्रकारिता योग्यता में नहीं, पत्रकार की अपने काम के प्रति ईमानदारी में है। जंतर-मंतर ने दिखाया कि स्टूडियो से बाहर सड़कों पर असली पत्रकारिता वैâसी होती है। जिन्हें लगता है कि नोटों के दम पर चैनलों पर पत्रकारिता जिंदा है या रहेगी, वे मुगालते में हैं। यह मिशन से कमीशन बनी पत्रकारिता और पत्रकारों के लिए आत्मचिंतन का समय है। जिस तरह से व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी प्रायोजित जंतर-मंतर की मन गढंत अंतरकथाएं अब परोसी जा रही हैं, इसका मकसद सिर्फ समर्थक समुदाय को खुश करना है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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