भारतीय जनता पार्टी ने राज्य की लगभग सभी नगरपालिकाओं, जिला परिषदों, नगर परिषदों पर जीत हासिल की और उसका विजय उत्सव भी मनाया, लेकिन स्थानीय निकायों का वास्तव में काम क्या है, नागरिकों और शहरों को क्या सेवाएं प्रदान करनी हैं, इसका ज्ञान न होने के कारण मुंबई, नागपुर, नासिक जैसे कई शहरों में बारिश ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। नासिक में सड़क के गड्ढों के कारण चौथी मौत हो गई। गड्ढों की वजह से नासिक में अब तक कम से कम साढ़े पांच सौ नागरिक घायल हो चुके हैं। नासिक में कुंभ मेला आयोजित होने वाला है, इसलिए जिस `चंपतराय’ मंत्री की विशेष नियुक्ति देवेंद्र फडणवीस ने की थी, वे गिरीश महाजन ऐसे दुखद अवसर पर कहां हैं? मंगलवार को नासिक के अंबड एमआईडीसी के एक्स्लो पॉइंट के पास ४० वर्षीय व्यापारी नीलेश कोतकर को सड़क के गड्ढों और कीचड़ ने मौत की सजा दे दी। पूरे शहर में विकास कार्यों के नाम पर सड़कें खोदकर रख दी गई हैं। उनमें बारिश के कारण कीचड़ पैâल गया है। दोपहिया वाहनचालक इन गड्ढों को सड़क समझकर आगे बढ़ते हैं और मारे जाते हैं। नासिक नगरपालिका अगर मामूली गड्ढे भी नहीं भर सकती, तो इस नगरपालिका को बर्खास्त करके नासिक के नगरपालिका आयुक्त और मेयर के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया जाना चाहिए। नासिक नगरपालिका की सत्ता बीजेपी और शिंदे गुट के पास है। इन दोनों ने मिलकर नासिकवासियों की जान से खिलवाड़ शुरू कर दिया है। सड़कें बची नहीं हैं। गड्ढे राक्षसों की तरह, मौत के जबड़ों की तरह जानें ले रहे हैं। इसके विरोध में शिवसेना के नगरसेवकों ने नगरपालिका में मेयर के दफ्तर में ही पूरे छह घंटे तक धरना दिया और सत्ताधारी बीजेपी-शिंदे गुट के कामकाज की धज्जियां उड़ार्इं। लेकिन सरकार में कुर्सियां तोड़ रहे नासिक के मंत्री कहां मुंह छिपाकर बैठे हैं? विधान परिषद चुनाव के समय भाग-दौड़ करने वाले ये मंत्री नासिक में गड्ढों के कारण बेगुनाहों की जान जाने के बावजूद
न तो मुंह दिखा रहे हैं
और न ही मुंह खोल रहे हैं। नासिक को गोद लेकर विकास का ढिंढोरा पीटने वाले, लेकिन अपनी राजनीति के लिए नासिक को प्रभारी मंत्री न देने वाले मुख्यमंत्री फडणवीस से भी अब जवाब मांगना ही पड़ेगा। नासिक महानगरपालिका में सत्ता पाने के लिए बीजेपी ने हर वार्ड में कम से कम पच्चीस करोड़ खर्च किए, तो शिंदे गुट ने पचास करोड़ का जोर लगाया। इसलिए इस पैसे की वसूली के लिए महानगरपालिका पसंदीदा ठेकेदारों के हाथों सौंप दी गई है, यही तस्वीर नजर आ रही है। वीर सावरकर ने क्रांति की जो चिंगारी नासिक में जलाई थी, वह गड्ढों में गिरकर बुझ गई। सावरकर के दौर में अगर बीजेपी की सत्ता होती तो जैक्सन का वध करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। वह खुद ही सड़क के गड्ढे में गिरकर मर जाता। कुसुमाग्रज को भी `गर्जा जयजयकार क्रांतीचा’ यह प्रेरणादायक गीत लिखने की प्रेरणा ही नहीं मिलती। क्योंकि कुसुमाग्रज की आंखों के सामने नासिक के गड्ढों में ब्रिटिश सैनिक मरते और तात्यासाहेब लिखते, `गर्जा जयजयकार खड्ड्यांचा… गर्जा जयजयकार!’ (जयजयकार करो गड्ढों का… करो जयजयकार!) अब शायद बीजेपी वाले नासिक के गड्ढों पर स्कूली किताबों में पाठ शामिल करेंगे और गड्ढों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक फायदों का विश्लेषण करेंगे। इतनी बेशर्मी बीजेपी में यकीनन भरी हुई है। उस बेशर्मी का फल आज महाराष्ट्र की जनता भुगत रही है। फिर सड़कों की यह बदहाली सिर्फ नासिक तक सीमित नहीं है। मुंबई, पुणे, छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर, कोल्हापुर, सातारा, सांगली, रायगढ़ जिलों में भी जहां नजर डालो, वहां सड़कों पर गड्ढों का साम्राज्य है। मुंबई-ठाणे की सड़कों की तो दुर्दशा हो चुकी है और महानगरपालिका के शिंदे-बीजेपी के सत्ताधारियों को उन गड्ढों में डालने के लिए नई-नवेली गाड़ियां चाहिए। नांदेड़ में तो सड़क पर बने १५ फीट के विशालकाय गड्ढे में प्रा. चंद्रशेखर एंगड़े की पूरी कार ही गिर गई। खुशकिस्मती से वक्त रहते बाहर कूद जाने के कारण प्रा. एंगड़े की जान बच गई, नांदेड़ महानगरपालिका के
सत्ताधारी बीजेपी का कामकाज
किस तरह गड्ढे में चला गया है, यही इस घटना से साबित होता है। मुख्यमंत्री के आदर्श नागपुर में बारिश ने कीचड़ और गंदगी का साम्राज्य खड़ा कर दिया है। कोई योजना न होने के कारण नागपुर डूब गया। मानसून शुरू होने से पहले नाले की सफाई और सड़क मरम्मत के दावे किए जाते हैं। टेंडर निकाले जाते हैं। बिल मंजूर किए जाते हैं। उससे पहले पच्चीस फीसदी कमीशन जेब में डाल लिया जाता है, लेकिन न सड़कें बनती हैं और न गड्ढे भरे जाते हैं। उन गड्ढों में हादसे होते हैं। कुछ की मौत हो जाती है, कुछ विकलांग हो जाते हैं। उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। सड़कों पर गड्ढे शासन की जानलेवा लापरवाही हैं। जब किसी गड्ढे के कारण कोई इंसान मरता है, तो वह सिर्फ एक हादसा नहीं होता, वह प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी होती है। यह मौत के जाल सरकारी मेहरबानी से बने हैं। राज्य में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, छात्र पेपर लीक होने के कारण खुदकुशी कर रहे हैं। बेरोजगार नौजवान हताशा में मौत को गले लगा रहे हैं और वह कम पड़ रहा हो तो सड़कों के गड्ढों में गिराकर लोगों को मारा जा रहा है। नासिक शहर तो गड्ढों से बना श्मशान बन चुका है। यह फडणवीस-शिंदे की शासन व्यवस्था की नाकामी है। महानगरपालिका, सार्वजनिक निर्माण विभाग, जिला प्रशासन, राज्य सरकार और सबसे आखिर में केंद्रीय सड़क मंत्री एक-दूसरे की तरफ उंगली उठाकर जिम्मेदारी टाल रहे हैं और नागरिक रोजाना गड्ढों, नालों, खुले मैनहोल में गिरकर मर रहे हैं। नासिक के नीलेश कोतकर सिर्फ एक मृतक का नाम नहीं हैं। वह महाराष्ट्र के उन हजारों नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले गड्ढों का शिकार हैं। आज नीलेश, कल कोई और। लोग मरते रहेंगे और बीजेपी के `चंपतराय’ झूठे आंसू बहाते हुए गुजरात के ठेकेदारों के साथ दलाली की `बिसात’ बिछाकर कुंभ मेले की तैयारी करते दिखेंगे। नासिक समेत पूरे महाराष्ट्र के गड्ढे ही अगर राज्य की पहचान बनने वाले हैं, तो गड्ढे में डालो यह सरकार!
