मुख्यपृष्ठस्तंभकांव-कांव : चोरी में आत्मनिर्भर देश

कांव-कांव : चोरी में आत्मनिर्भर देश

हरिगोविंद विश्वकर्मा

एक देश है, बहुत तेजी से तरक्की कर रहा है। पिछले पिचहत्तर साल के दौरान केवल और केवल तरक्की ही हुई है। जैसा कि होता है, तरक्की जब ज्यादा हो जाती है। यानी और तरक्की की गुंजाइश नहीं रह जाती है। तब मान लिया जाता है कि देश आत्मनिर्भर हो गया। पिछले कुछ दशक में देश में हत्या, अपहरण आदि में अच्छा काम हुआ। लेकिन बेचारी चोरी पिछड़ गई थी। कई लोग चोरी कर-करके इसे प्रगति की राह पर लाना चाहते थे, लेकिन चोरी थी कि कछुआ चाल चल रही थी। लेकिन अब चोरी खरगोश की तरह भार रही है। देश में धड़ल्ले से चोरी हो रही है। चोरी ने बहुत तरक्की कर ली है। इसलिए कहा जा सकता है कि देश ने चोरी में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है।
स्टार्टअप मॉडल
एक समय था जब चोरी का स्तर बहुत साधारण हुआ करता था। कोई रात के अंधेरे में सेंध लगाकर दो पीतल के लोटे चुरा लेता था। कोई साइकिल चुरा लेता था। चोरों में भी संकोच बचा हुआ था। वे चोरी करके भागते थे। उन्हें पकड़े जाने का डर रहता था। लेकिन समय बदल चुका है। चोरी ने देश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विकास किया है। एक तरह से चोरी ने आधुनिकता को गले लगा लिया है। अब चोरी भी आत्मविश्वास के साथ होती है। कई बार तो चोरी इतनी खुलेआम होती है कि चोर को भागने की भी जरूरत नहीं पड़ती।
कई चोर विशेषज्ञों का मानना है कि चोरी अब स्टार्टअप मॉडल पर काम कर रही है। इसमें रिसर्च, इनोवेशन और स्किल डेवलपमेंट का समावेश हो चुका है। पहले चोरी व्यक्तिगत प्रतिभा थी, अब यह संगठित उद्योग बन चुकी है। यही किसी भी आत्मनिर्भर राष्ट्र की पहचान होती है। पहले केवल जेबें कटती थीं, लेकिन आजकल अवसर काट लिए जाते हैं। पहले घरों के ताले टूटते थे। आजकल विश्वास टूटता है। पहले तिजोरियां खाली होती थीं। आजकल लोगों की उम्मीदें खाली हो जाती हैं। यही तो सर्वांगीण विकास है।
चोर रत्न पुरस्कार
आजकल चोरी करना सम्मान की बात हो गई है। सरकार को चोरी को औपचारिक मान्यता देने पर विचार करना चाहिए। `राष्ट्रीय चोरी प्रोत्साहन परिषद’ बनाई जा सकती है। योग्य चोरों को प्रशिक्षण दिया जाए। नए युवाओं के लिए स्किल प्रोजेक्ट के तहत `एडवांस्ड चोरी मैनेजमेंट’ का डिप्लोमा शुरू किया जा सकता है। सिलेबस में `सीसीटीवी देखकर भी न घबराना’, `पकड़े जाने पर आत्मविश्वास से मुस्कुराना’ और `गलती स्वीकार न करने की कला’ जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को `चोर रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा सकता है।
कई चोर इतिहासकार बताते हैं, कभी चोरी को बुरा काम माना जाता था। लोग चोरी करने के बाद चेहरा छिपाते थे। आजकल यह हीनभावना समाप्त हो चुकी है। यही सामाजिक प्रगति का प्रतीक है। अब कई लोग आत्मविश्वास से चोरी करते हैं। इतने आत्मविश्वास से कि यदि उन पर उंगली उठाई जाए तो वे उल्टा पूछ बैठते हैं, `सबूत कहां है?’ यह चोरी में आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा है।
जैसा कि बताया जा चुका है, पहले पैसे चुराते थे। फिर साइकिल, फिर भूमि चोरी हुई। पिछले कुछ दशक से विचार चुराए जाने लगे हैं। आजकल तो लोग श्रेय चुरा लेते हैं। अब देश में जनादेश और बच्चों का भविष्य चुराने की स्पर्धा है। लेटेस्ट डेवलपमेंट यह है कि अब शर्म और ईमानदारी भी चोरी होने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी चोरी ने विकास की नई ऊंचाइयां छू ली हैं। अब पूरी की पूरी योजनाएं, विचार और उपलब्धियां चोरी कर लेते हैं। शहरों में तो प्रतिस्पर्धा और भी तीव्र है। इसे आधुनिक अर्थव्यवस्था की साझेदारी कहा जाता है। अगर देश की बात करें तो चोरी सेक्टर ने विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
स्वदेशी क्षमता
हालांकि, कुछ लोग अब भी पुराने विचारों में अटके हुए हैं। वे कहते हैं कि चोरी रुकनी चाहिए। ऐसे लोग विकास की गति नहीं समझते हैं। यदि चोरी रुक गई तो `चोरी में आत्मनिर्भरता’ का सपना अधूरा रह जाएगा। इसलिए समय की मांग है कि हम चोरी सेक्टर की उपलब्धियों का सम्मान करें। जिस देश ने हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लिया है, वह चोरी में पीछे क्यों रहे?
अब गर्व से कह सकते हैं कि चोरी के लिए किसी विदेशी तकनीक, विदेशी चोर या विदेशी सलाह की आवश्यकता नहीं है। इस क्षेत्र में हमने ऐसी स्वदेशी क्षमता विकसित कर ली है कि दुनिया चाहे तो यहां से प्रशिक्षण ले सकती है। आखिर आत्मनिर्भर देश का अर्थ ही यही है कि जो काम करना हो, उसे अपने दम पर किया जाए, चाहे वह काम चोरी ही क्यों न हो!

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