-पुलिस बर्बरता के जख्म भरने के बजाय प्रदर्शनकारियों पर ही कार्रवाई ने खड़े किए कई सवाल
उमन गुप्ता
देश की राजधानी का जंतर-मंतर कभी लोकतांत्रिक आवाजों का सबसे बड़ा मंच माना जाता था। किसान हों, छात्र हों, बेरोजगार युवा हों या सामाजिक संगठन। हर वर्ग अपनी बात लेकर यहीं पहुंचता रहा है, लेकिन हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की सख्ती, हिरासत, बैरिकेडिंग और बल प्रयोग की घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या असहमति जताना अब प्रशासन की नजर में अपराध बनता जा रहा है?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को लेकर विपक्ष और नागरिक अधिकार संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से बैठे प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए जिस तरह पुलिस बल का इस्तेमाल किया गया, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और निहत्थे होकर अपनी बात रखने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय भी विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। हालांकि, यह अधिकार उचित और कानूनी प्रतिबंधों के अधीन हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, तो इतनी कठोर पुलिस कार्रवाई की आवश्यकता क्यों पड़ी? सरकार विरोध की आवाजों के प्रति लगातार अधिक असहिष्णु होती दिखाई दे रही है। जहां सत्ता समर्थक आयोजनों को प्रशासनिक सहयोग मिलता है, वहीं सरकार से सवाल पूछने वालों के सामने बैरिकेड, हिरासत और पुलिस बल खड़ा दिखाई देता है। दूसरी ओर सरकार और पुलिस का पक्ष है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है और यदि किसी प्रदर्शन से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो, तो आवश्यक कार्रवाई की जाती है। जंतर-मंतर की घटना ने केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और राज्य की शक्तियों के बीच संतुलन पर नई बहस छेड़ दी है। देशभर में विभिन्न छात्र संगठनों, सामाजिक समूहों और विपक्षी दलों ने इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा है कि लोकतंत्र में संवाद का स्थान बल प्रयोग नहीं ले सकता। सवाल केवल इतना नहीं कि प्रदर्शनकारियों को हटाया गया। बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में असहमति की आवाजों के लिए जगह लगातार सिमटती जा रही है?
लोकतंत्र की सेहत को लेकर चिंता
यदि जनता की आवाज बैरिकेडों के पीछे वैâद होने लगे तो लोकतंत्र की सेहत पर चिंता स्वाभाविक है। लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता की प्रशंसा में नहीं, बल्कि आलोचना सुनने की क्षमता में होती है। जंतर-मंतर की हालिया घटनाओं ने एक बार फिर देश के सामने यही सवाल खड़ा कर दिया है कि विरोध का अधिकार कितना सुरक्षित है और राज्य की शक्ति की सीमा कहां तक होनी चाहिए।
