मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात : अदालत की ‘झाड़’ के बाद मंत्रालय में झाड़ू!

अंदर की बात : अदालत की ‘झाड़’ के बाद मंत्रालय में झाड़ू!

राजन पारकर

सत्ता को आईना दिखाने का काम जनता करती है, लेकिन जब जनता की आवाज दबा दी जाए तो अदालत को आईना उठाना पड़ता है। मुंबई हाई कोर्ट की टिप्पणी ने मंत्रालय के गलियारों में ऐसी हलचल मचा दी कि वर्षों से धूल खा रही सफाई व्यवस्था अचानक सक्रिय हो गई। चर्चा है कि जिन अधिकारियों की रिपोर्ट में मंत्रालय की वैंâटीन स्वर्ग जैसी दिखाई दे रही थी, उन्हें अब वास्तविकता का सामना करना पड़ सकता है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि यदि सरकारी संस्थानों पर भी वही पैमाना लागू हुआ जो निजी होटलों पर लागू किया जाता है, तो कई विभागों की फाइलें खुल सकती हैं। सूत्रों के अनुसार, अदालत की सख्ती केवल वैंâटीन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यशैली भी जांच के घेरे में आ सकती है। कहा जा रहा है कि कुछ अधिकारियों की कुर्सियां हिल रही हैं, क्योंकि अदालत ने साफ संदेश दिया है कि कानून का तराजू सरकारी और निजी संस्थानों के लिए अलग-अलग नहीं हो सकता।
सत्ता के गलियारों में मची हलचल!
राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सत्ता के सामने अब केवल विपक्ष नहीं, बल्कि अदालत, छात्र और जनता, तीनों एक साथ सवाल खड़े कर रहे हैं। कहीं मंत्रालय की वैंâटीन अदालत के आदेश पर चमकाई जा रही है, कहीं शिक्षा व्यवस्था पर उठे जनआक्रोश ने मंत्री बदलवा दिए, तो कहीं विकास के दावों की पोल सड़कों के गड्ढे खोल रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, इन घटनाओं ने कई अधिकारियों की कुर्सियों और कुछ नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
शिक्षा मंत्री बदले, लेकिन क्या व्यवस्था बदलेगी?
राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि कुर्सी बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती, सोच बदलनी पड़ती है। छात्र आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय में बदलाव ने सत्ता को यह संदेश दे दिया कि युवाओं की आवाज को लंबे समय तक अनसुना नहीं किया जा सकता। अब सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि जब सत्ताधारी दल के नेताओं के परिवारों से भी सरकार पर सवाल उठने लगे, तो यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि अंदरूनी बेचैनी का संकेत है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर भी इस पूरे घटनाक्रम की समीक्षा हो रही है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई बड़े पैâसलों की दोबारा समीक्षा हो सकती है। चर्चा यह भी है कि जिन अधिकारियों ने परीक्षा प्रणाली और छात्रों की शिकायतों को हल्के में लिया, उनकी जवाबदेही तय हो सकती है। सवाल केवल मंत्री बदलने का नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने का है।
विकास के दावों को गड्ढों ने निगल लिया
यदि सड़कें ही सरकार का आईना होती हैं, तो नासिक की सड़कें आज सत्ता से सबसे कठिन सवाल पूछ रही हैं। मंत्री छगन भुजबल का सार्वजनिक आक्रोश यह बताता है कि अब सरकार के भीतर भी विकास के दावों पर असंतोष बढ़ रहा है। चर्चा है कि नासिक की बदहाल सड़कों ने केवल जनता को नहीं, बल्कि मंत्रियों को भी असहज कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सार्वजनिक निर्माण और स्थानीय प्रशासन के कुछ अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की तैयारी हो सकती है। सूत्रों के अनुसार, यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो मामला मंत्रिमंडल की बैठक तक पहुंच सकता है। चर्चा तो यहां तक है कि आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में यही गड्ढे कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य के गड्ढे भी साबित हो सकते हैं। जनता अब भाषण नहीं, सड़क चाहती है। सत्ता के गलियारों में इन दिनों तीन आवाजें सबसे तेज सुनाई दे रही हैं, अदालत की फटकार, छात्रों का आक्रोश और जनता की नाराजगीr। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ अफसरों की कुर्सियां डगमगा रही हैं, कुछ नेताओं की साख पर सवाल उठ रहे हैं और कुछ टिकटों पर भी पुनर्विचार हो सकता है।

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