सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र सरकार के मंत्रालय की कैंटीन को लेकर खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा किया गया “98 प्रतिशत स्वच्छता” का दावा मुंबई उच्च न्यायालय की जांच में पूरी तरह धराशायी हो गया है। न्यायालय के निर्देश पर अधिवक्ताओं के एक दल द्वारा किए गए निरीक्षण में मंत्रालय की कैंटीन में मक्खियों का जमावड़ा, जंग लगे चाकू, टूटी हुई फर्श की टाइलें तथा ड्रेनेज का रिसता हुआ गंदा पानी जैसी गंभीर खामियां सामने आने के बाद सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जिस मंत्रालय से पूरे महाराष्ट्र के लिए स्वच्छता, स्वास्थ्य और प्रशासन के मानक तय किए जाते हैं, उसी मंत्रालय की कैंटीन की यह स्थिति सरकार के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब वास्तविकता इतनी भयावह थी, तब FDA ने आखिर किस आधार पर “98 प्रतिशत स्वच्छ” होने का प्रमाणपत्र दिया? मंत्रालय मे कँटीन मे बने खाने का स्तर भी गिरा है विशेष रूप से वाह के काम करने वाले कंत्राटी कर्मचारी को जादा वर्क लोड दे कर कंत्राटी कर्मचारी के करार के अनुसार वेतन दिया नही जाता है बहुत सी कट होती है ऐसा कंत्राटी कर्मचारी मे नाम न कहने पर जानकारी दी है
इस पूरे मामले में मंत्रालय की कैंटीन का प्रबंधन संभालने के लिए हाल ही में सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) से आए अवर सचिव स्तर के एक प्रबंधकीय अधिकारी की भूमिका को लेकर भी मंत्रालय के गलियारों में दबे स्वर में चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। यह भी कहा जा रहा है कि संबंधित अधिकारी को एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी का संरक्षण प्राप्त होने के कारण प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित कठोर कार्रवाई नहीं हो रही है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
यदि इन चर्चाओं में जरा भी सच्चाई है, तो यह केवल कैंटीन की सफाई का मामला नहीं, बल्कि जवाबदेही और प्रशासनिक संरक्षण की संस्कृति का भी गंभीर प्रश्न बन जाता है। आखिर किसके भरोसे मंत्रालय की कैंटीन चलाई जा रही थी? निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी क्या केवल फाइलों तक सीमित थे?
मुंबई उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी और निरीक्षण रिपोर्ट के बाद अब राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल सफाई अभियान चलाकर मामला शांत कर दिया जाएगा, या फिर गलत रिपोर्ट देने वालों, निगरानी में लापरवाही बरतने वालों तथा यदि किसी स्तर पर संरक्षण दिया गया है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जाएगी?
मंत्रालय की कैंटीन की यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि सरकारी कागजों पर दिखाई जाने वाली “स्वच्छता” और जमीन पर मौजूद वास्तविकता में कितना बड़ा अंतर हो सकता है। अब महाराष्ट्र की जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस मामले में केवल दिखावटी कार्रवाई करती है या वास्तव में दोषियों को कानून के कटघरे तक पहुंचाती है।
