प्रो. दयानंद तिवारी
-‘जहां शहीदों के रक्त ने स्वतंत्रता की भूमि सींची, वहीं साहित्यकारों की स्याही ने जनमानस में स्वाधीनता की ज्योति जलाई’
१५ अगस्त का सूर्योदय केवल एक नए दिन का उदय नहीं था। वह सदियों की पराधीनता के अंधकार को चीरकर निकली वह स्वर्णिम प्रभात-किरण थी, जिसके पीछे असंख्य बलिदानों की अग्नि थी, क्रांतिकारियों का रक्त था, माताओं के आंसू थे और साहित्यकारों की लेखनी की अनवरत तपस्या थी।
भारत को आजादी यूं ही नहीं मिली। इसके लिए यदि रणभूमि में तलवारें उठीं, तो साहित्य के प्रांगण में कलमें भी विद्रोह की मशाल बनकर जलीं। किसी ने फांसी के फंदे को चूमा, किसी ने कारागार की कालकोठरी स्वीकार की और किसी ने अपने शब्दों में ऐसी अग्नि भर दी कि सोया हुआ राष्ट्र जाग उठा।
भारत का स्वतंत्रता-संग्राम केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का संघर्ष नहीं था; वह मानसिक, सांस्कृतिक और वैचारिक मुक्ति का भी विराट आंदोलन था। अंग्रेज भारत की भूमि को अपने अधीन कर सकते थे, लेकिन भारत की आत्मा को पराधीन रखना उनके लिए संभव नहीं था। उस आत्मा को जीवित रखने, उसे झकझोरने और उसके भीतर स्वाभिमान जगाने का सबसे सशक्त माध्यम बना-साहित्य।
‘वंदे मातरम’ : जब कविता राष्ट्र का मंत्र बन गई
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकले शब्दों ने मातृभूमि को केवल धरती नहीं, बल्कि मां के रूप में प्रतिष्ठित किया। आनंदमठ में समाहित ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में ऐसा स्वर बना, जिसे सुनकर असंख्य हृदय राष्ट्रप्रेम से भर उठते थे।
‘वंदे मातरम!
सुजलां सुफलां,
मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।’
ये केवल काव्य-पंक्तियां नहीं थीं; यह पराधीन भारत की धड़कन थी। ‘वंदे मातरम’ कहते हुए क्रांतिकारी अंग्रेजी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर खड़े होते थे। जब कविता किसी राष्ट्र का उद्घोष बन जाए, तब साहित्य की शक्ति का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है?
मैथिलीशरण गुप्त : अतीत के गौरव से भविष्य का आह्वान
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ ने भारतीय समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारतवासियों के सामने प्रश्न रखा कि हमारा गौरवशाली अतीत क्या था, हमारी वर्तमान दशा क्या है और हमारा भविष्य कैसा होना चाहिए।
उनका प्रसिद्ध आत्ममंथनकारी स्वर इस तरह है कि
‘हम कौन थे, क्या हो गए हैं,
और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर,
ये समस्याएं सभी।’
इन पंक्तियों में केवल कविता नहीं, राष्ट्रीय आत्मचिंतन है। गुलामी केवल शरीर पर लगी बेड़ी नहीं होती; वह मनुष्य के आत्मविश्वास को भी जकड़ती है। गुप्त जी की कविता ने उसी खोए हुए आत्मविश्वास को पुन: जगाने का कार्य किया।
पुष्प भी मातृभूमि पर न्योछावर होना चाहता था
माखनलाल चतुर्वेदी की ‘पुष्प की अभिलाषा’ ने देशप्रेम और बलिदान को अत्यंत कोमल किंतु ओजस्वी स्वर दिया। एक साधारण पुष्प की इच्छा के माध्यम से कवि ने उस युग के युवाओं की आकांक्षा व्यक्त की जीवन का सर्वोच्च सौंदर्य मातृभूमि के लिए समर्पित हो जाने में है।
‘मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक।’
यह कविता विद्यालयों से लेकर स्वतंत्रता-सेनानियों की सभाओं तक राष्ट्रीय चेतना का स्वर बनी। यहां पुष्प केवल पुष्प नहीं रहता; वह राष्ट्र के चरणों में स्वयं को अर्पित करने को तत्पर भारतीय युवक का प्रतीक बन जाता है।
झांसी की रानी : कविता से पुनर्जीवित हुआ शौर्य
सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी अमर कविता ‘झांसी की रानी’ के माध्यम से वीरांगना लक्ष्मीबाई को प्रत्येक भारतीय के मानस में जीवंत कर दिया। उनकी ओजस्वी पंक्तियां सुनते ही पराधीनता के विरुद्ध प्रतिरोध का इतिहास आंखों के सामने खड़ा हो जाता था।
‘बुंदेले हरबोलों के मुंह
हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झांसी वाली रानी थी।’
इस कविता ने विशेष रूप से नई पीढ़ी और महिलाओं में राष्ट्रप्रेम तथा साहस की चेतना जगाई। साहित्य ने इतिहास को केवल सुरक्षित नहीं रखा; उसने इतिहास के शौर्य को वर्तमान की शक्ति बना दिया।
‘सरफरोशी की तमन्ना’ : जब मृत्यु से बड़ा हो गया वतन
स्वतंत्रता-संग्राम के क्रांतिकारी दौर में एक और स्वर नौजवानों की रगों में बिजली की तरह दौड़ा ‘सरफरोशी की तमन्ना’। इस प्रसिद्ध गजल के मूल रचनाकार बिस्मिल अजीमाबादी थे और रामप्रसाद बिस्मिल सहित अनेक क्रांतिकारियों ने इसे स्वतंत्रता-संग्राम की प्रखर आवाज बना दिया।
‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है।’
इन शब्दों में उस पीढ़ी की निर्भीकता बोलती थी, जिसके लिए मृत्यु भय नहीं, मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए दिया जाने वाला मूल्य थी। अंग्रेजी सत्ता क्रांतिकारियों को कारागार में डाल सकती थी, परंतु उस विचार को वैâसे वैâद करती जो कविता बनकर हजारों-लाखों हृदयों में प्रवेश कर चुका था?
कलम भी स्वतंत्रता की सेनानी थी
उस काल में केवल कविताएं ही नहीं, कहानियां, उपन्यास, निबंध, समाचार-पत्र और पत्रिकाएं भी स्वतंत्रता-संग्राम के अस्त्र बन गए थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पराधीन भारत की पीड़ा को शब्द दिए। मुंशी प्रेमचंद ने गरीबी, अन्याय और शोषण से जूझते भारत को साहित्य के केंद्र में खड़ा किया। बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और अनेक राष्ट्रनायकों ने पत्रकारिता और लेखन के माध्यम से राजनीतिक चेतना को घर-घर पहुंचाया।
ब्रिटिश सत्ता इस शक्ति को पहचानती थी। इसीलिए समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध लगे, प्रकाशन जब्त हुए, संपादकों पर मुकदमे चले और लेखकों को जेल जाना पड़ा। किंतु सत्ता एक बात भूल गई थी-कलम को बंद किया जा सकता है, विचार को नहीं; पुस्तक को जब्त किया जा सकता है, चेतना को नहीं।
साहित्य की यही अद्भुत शक्ति है। तलवार शरीर को घायल करती है, किंतु साहित्य मनुष्य की चेतना को जगा देता है। और जब किसी राष्ट्र की चेतना जाग जाती है, तो संसार की कोई भी साम्राज्यवादी शक्ति उसे अधिक समय तक पराधीन नहीं रख सकती।
आजादी का अर्थ केवल उत्सव नहीं, उत्तरदायित्व भी है
आज जब १५ अगस्त को तिरंगा आकाश में गर्व से लहराता है, तब हमें उन सैनिकों और क्रांतिकारियों के साथ-साथ उन साहित्यकारों को भी नमन करना चाहिए, जिन्होंने स्वतंत्रता की मानसिक और वैचारिक भूमि तैयार की।
आजादी की गाथा जब भी लिखी जाएगी, उसमें शहीदों के रक्त के साथ साहित्यकारों की स्याही भी दिखाई देगी। क्योंकि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई केवल रणभूमि में नहीं लड़ी गई थी-वह कविताओं में गूंजी थी, कहानियों में जागी थी, अखबारों में दहकी थी और गीत बनकर गांव-गांव, नगर-नगर पहुंची थी।
आज भी साहित्य का दायित्व समाप्त नहीं हुआ है। जिस कलम ने कभी गुलाम भारत को स्वतंत्रता का स्वप्न दिखाया था, उसी कलम को आज स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, मानवीय संवेदना और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध की ज्योति जलाए रखनी है।
आजादी हमें यूं ही नहीं मिली
किसी ने रक्त दिया, किसी ने प्राण दिए,
किसी ने हंसते-हंसते फांसी को चूम लिया,
और किसी ने शब्दों में ऐसी आग लिखी
कि एक सोया हुआ राष्ट्र जाग उठा।
यही साहित्य की साधना थी, यही स्वतंत्रता की आराधना थी और यही उन अमर कलमकारों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।
अस्तु
