-सीनेट में ८६-११ से बिल पास, रूसी तेल खरीदने पर भारत समेत बड़े खरीदार निशाने पर
-ट्रंप से दोस्ती के दावों के बीच दिल्ली के सामने नया आर्थिक संकट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ कथित ‘विशेष दोस्ती’ और भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत के सरकारी दावों के बीच वॉशिंगटन से ऐसा झटका आया है, जिसने भारतीय कूटनीति के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी सीनेट ने रूस पर आर्थिक शिकंजा कसने वाले व्यापक प्रतिबंध विधेयक को ८६-११ के भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट-दोनों दलों के सांसद इसके समर्थन में एकजुट हुए।
इस विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों से आने वाले सामान पर १०० प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है। निशाने पर सबसे प्रमुख रूप से भारत और चीन हैं। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले बड़े देशों में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान का नाम सामने आया है। अब इस बिल को प्रतिनिधि सभा की मंजूरी की जरूरत होगी।
इस कानून का असली निशाना रूस की वह ऊर्जा कमाई है, जिससे अमेरिका का मानना है कि यूक्रेन युद्ध के लिए मॉस्को को आर्थिक ताकत मिल रही है। विधेयक में रूसी अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों, ऊर्जा परियोजनाओं और प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे कथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी शिकंजा कसने के प्रावधान हैं।
५०० प्रतिशत से शुरू हुआ था दबाव, अब १०० प्रतिशत पर अटका निशाना
इस प्रस्ताव का शुरुआती स्वरूप और भी खतरनाक था। पहले रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर ५०० प्रतिशत तक टैरिफ की व्यवस्था प्रस्तावित थी। बाद में संशोधित मसौदे में अधिकतम टैरिफ घटाकर १०० प्रतिशत कर दिया गया और कार्रवाई को बड़े रूसी तेल खरीदारों पर केंद्रित किया गया।
सवाल दोस्ती का नहीं, नतीजे का है!
मोदी सरकार वर्षों से अमेरिका से रिश्तों को अपनी विदेश नीति की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाती रही है। कभी ‘हाउडी मोदी’, कभी ‘नमस्ते ट्रंप’ और कभी दोनों नेताओं की निजी मित्रता को भारत की कूटनीतिक ताकत के प्रमाण की तरह पेश किया गया। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तस्वीर साफ है, देश दोस्ती नहीं, अपना हित देखते हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि भारत को अपने ऊर्जा हितों की रक्षा के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदने पर भी अमेरिका के १०० प्रतिशत टैरिफ की तलवार झेलनी पड़े, तो आखिर उस बहुप्रचारित व्यक्तिगत कूटनीति से भारत को ठोस फायदा क्या मिला?
