मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का: सड़कें हैं या भ्रष्टाचार के स्मारक?

तड़का: सड़कें हैं या भ्रष्टाचार के स्मारक?

कविता श्रीवास्तव

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का सपना देख रहा है। देश में एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, हाईवे चौड़े हो रहे हैं, पुल और सुरंगें तैयार हो रही हैं। सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ सड़कें बना रहे हैं, या टिकाऊ सड़कें भी बना रहे हैं? लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे से जुड़ी तस्वीरें इस सवाल को और गंभीर बना देती हैं। सड़क की सतह को सुखाने के लिए साधारण पंखे लगाने की तस्वीरें चर्चा में हैं। न जाने कौन सी इंजीनियरिंग है ये! यह दृश्य जितना हास्यास्पद है, उतना ही चिंताजनक भी है। आखिर करोड़ों-अरबों रुपए की लागत से बने एक्सप्रेसवे की ऐसी स्थिति हुई ही क्यों? सड़क बनाने के लिए हमें कुशल इंजीनियरिंग चाहिए, पंखे नहीं। इमानदारी से किया गया काम चाहिए। देश में पिछले कुछ दशकों में सड़क और परिवहन ढांचे का तेजी से विस्तार हुआ है। लेकिन सड़कें सिर्फ डामर और कंक्रीट की परत नहीं हैं। वे उद्योगों की रफ्तार, व्यापार की गति, किसानों की बाजार तक पहुंच, यात्रियों की सुरक्षा और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती हैं। यदि नई सड़कें जल्दी से टूटने लगें, पुलों के रैंप क्षतिग्रस्त हो जाएं, जल निकासी की व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाए या सुरंगें और हाईवे प्राकृतिक परिस्थितियों का सामना न कर पाएं, तो सवाल पूरी व्यवस्था की नीयत, निगरानी और जवाबदेही पर उठता है।
दुर्भाग्य से देश के कई हिस्सों में ऐसी शिकायतें और घटनाएं सामने आती रही हैं। इसीलिए संदेह पैदा होता है कि ठेकेदारों को गुणवत्ता से ज्यादा भुगतान और राजनीतिक पहुंच की चिंता तो नहीं है। ठेका किसी कंपनी को दिया जाता है, लेकिन कीमत जनता चुकाती है। पहली बार टैक्स के रूप में। दूसरी बार टोल के रूप में और तीसरी बार खराब सड़क से होने वाली दुर्घटनाओं, ट्रैफिक जाम, समय की बर्बादी और वाहन क्षति के रूप में। यदि सड़क खराब बनी हैं तो जिम्मेदार कौन है? ठेकेदार? इंजीनियर? गुणवत्ता जांचने वाली एजेंसी? संबंधित विभाग? या फिर वह पूरी व्यवस्था, जिसमें कागज पर सब कुछ शानदार किंतु हकीकत में कमजोर दिखाई देता है? सिर्फ ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करना समाधान नहीं है। जवाबदेही पूरी प्रक्रिया की तय होनी चाहिए। काम देने से लेकर डिजाइन, सामग्री की जांच, निर्माण की निगरानी, भुगतान और अंतिम प्रमाणपत्र तक हर चरण का स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए। जनता को ऐसी सड़कें नहीं चाहिए, जिन्हें उद्घाटन के लिए चमकाया जाए और बरसात में पंखों से सुखाया जाए। उसे ऐसी सड़कें चाहिए जो वर्षों तक चलें। विकास का मतलब सिर्फ किलोमीटर बढ़ाना नहीं है। विकास का असली मतलब है गुणवत्ता, सुरक्षा, पारदर्शिता और जनता के पैसे का सम्मान। अब समय आ गया है कि ‘ठेकेदार राज’ की जगह ‘जवाबदेही’ का राज कायम हो। देश को पंखों से सूखने वाली सड़कें नहीं, मजबूत इंजीनियरिंग और ईमानदार व्यवस्था चाहिए।

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