तौसीफ कुरैशी
लोकतंत्र में असहमति उसका प्राण है। महात्मा गांधी ने भी विरोध और अपमान के बावजूद प्रतिशोध का रास्ता नहीं अपनाया। उनका संदेश था कि विचारों की लड़ाई विचारों से ही जीती जाती है।
चेहरे पर पोती गई कालिख पानी से धुल जाती है, लेकिन लोकतंत्र के चेहरे पर लगे दाग आसानी से नहीं मिटते। नेहा बोरा पर कालिख फेंकने की घटना को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है। किसी के विचार पसंद न हों तो उसका विरोध तर्क और संवाद से होना चाहिए, हिंसा और अपमान से नहीं।
जब सवालों के जवाब देने के बजाय किसी के चेहरे पर कालिख पोती जाती है, तो यह विचारों की कमजोरी को दिखाता है। लोकतंत्र में असहमति उसका प्राण है। महात्मा गांधी ने भी विरोध और अपमान के बावजूद प्रतिशोध का रास्ता नहीं अपनाया। उनका संदेश था कि विचारों की लड़ाई विचारों से ही जीती जाती है। आज सार्वजनिक जीवन में सोशल मीडिया की गालियां, राजनीतिक आरोप और सड़कों पर बढ़ती उग्रता चिंता का विषय हैं। किसी को देशद्रोही कहना आसान हो गया है, लेकिन किसी अपराध का पैâसला भीड़ नहीं, अदालत करती है। अलग राय रखने वाला व्यक्ति दुश्मन नहीं हो सकता। यदि आज किसी पत्रकार, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता या राजनीतिक विरोधी पर हमला सामान्य मान लिया गया, तो कल यही हिंसा किसी और के दरवाजे तक पहुंच सकती है। हिंसा कभी एक दिशा में नहीं चलती, अंतत: सभी को घायल करती है।
सत्ता की जिम्मेदारी केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता का विश्वास बनाए रखना भी है। संसद इसलिए है कि सवाल पूछे जाएं, बहस हो और जवाब दिए जाएं। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता आलोचना सुने और विरोधी भी भाषा की मर्यादा बनाए रखें। कालिख किसी चेहरे को ढक सकती है, लेकिन विचारों और सवालों को खत्म नहीं कर सकती। इसलिए जरूरत कालिख के डिब्बे बंद करने और संवाद के दरवाजे खोलने की है। लोकतंत्र डर से नहीं, बहस से सुरक्षित होता है। जब बहस की जगह कालिख ले ले, तो दाग किसी एक चेहरे पर नहीं, पूरी लोकतांत्रिक संस्कृति पर लगता है।
सत्यमेव जयते।
