मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर: बड़ी हलचल है सतह के नीचे

प्रणवाक्षर: बड़ी हलचल है सतह के नीचे

प्रणव प्रियदर्शी

पिछले महीने यानी जुलाई की २० तारीख देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करनेवाली एक अहम तारीख के रूप में बरसों याद रखी जाएगी। लेकिन उसके बाद के इन २० दिनों का एक लेखा-जोखा लिया जाए तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के अलावा कोई दूसरी बड़ी घटना नहीं दिखती पहली नजर में। हालांकि, जूम करके एक बार फिर से देखें तो कई ऐसी चीजें दिखती हैं जो बताती हैं कि सतह के नीचे ऐसी हलचल है, जिसे सामान्य नहीं कहा जा सकता। बहुत संभव है कि जल्दी ही यह किसी बड़े विस्फोट के रूप में सामने आ जाए।
निशाने पर अमित शाह
एक बड़ी बात तो यही है कि धर्मेंद्र प्रधान या किसी अन्य मंत्री के बजाय अब अमित शाह सबके निशाने पर आ गए। शांतिपूर्ण आंदोलन पर असाधारण पुलिसिया दमन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माफी और अमित शाह से इस्तीफे की मांग को तेज कर दिया। इस बीच पेपर लीक को लेकर एक संशोधन विधेयक संसद में पेश कर के पास भी कर दिया गया, उस पर लंबी चर्चा भी हुई, लेकिन न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सदन में दिखे और न गृहमंत्री अमित शाह।
गालियों में अटका मन
माफी की मांग नरेंद्र मोदी ने देर रात इंस्टाग्राम पर आकर इस रूप में जरूर पूरी कर दी कि उन्होंने आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं को माफ करने का एलान कर दिया। किस बात के लिए? उन गालियों के लिए, जो आंदोलन में शामिल कुछेक लड़के-लड़कियों ने उनके नाम निकाली थीं। गालियां निकालने वाले वे लोग आंदोलन का नेतृत्व करनेवालों में शामिल नहीं थे, न ही ये गालियां आंदोलन का मुख्य स्वर कभी बन पाई थीं। मगर प्रधानमंत्री मोदी का मन उन्हीं गालियों पर अटका रहा। वह उन गालियों की तरफ भूलकर भी नहीं गया, जो सभ्य, लोकतांत्रिक और क्रिएटिव नारों से आंदोलन को विशिष्ट बना रहे लड़के-लड़कियों को सोशल मीडिया पर उनकी ट्रोल आर्मी लगातार देती रही है।
एक अहम हस्तक्षेप
बहरहाल, सवाल यह था कि इस सत्र में ढंग से कुछ कामकाज भी होगा या यह पूरा सत्र प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के पलायन की भेंट चढ़ जाएगा? यह चिंता सत्तापक्ष के भी कुछ हिस्सों को बेचैन किए हुए थी। इसका एक बड़ा अर्थपूर्ण संकेत तब मिला जब एक दिन राज्यसभा में खुद उपराष्ट्रपति ने संसदीय कार्यमंत्री को निर्देश दिया कि ‘विपक्ष गृहमंत्री से बयान देने की मांग कर रहा है, आप उन तक विपक्ष की भावना पहुंचा दीजिए।’ इस अहम हस्तक्षेप का सरकार के रुख पर असर भी तब दिख गया जब सोमवार को संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में एलान किया कि गृहमंत्री अमित शाह बयान देने को तैयार हैं।
सीधा संवाद
यही नहीं, प्रधानमंत्री की पाखंडपूर्ण माफी और सरकार की पुलिसिया सख्ती के बाद बीजेपी ही नहीं, संघ हलकों से भी आंदोलन के खिलाफ तीखी टिप्पणियां आने लगी थीं। संघ के एक कथित प्रतिष्ठित बौद्धिक ने फरमाया कि जंतर-मंतर पर जिस तरह की लड़कियां आ रही थीं, उन्हें रेप करवाने में मजा आता है। इसके ठीक बाद संघ प्रमुख के संभावित उत्तराधिकारी बताए जाने वाले एक वरिष्ठ पदधारी ने इस आंदोलन को राष्ट्रविरोधी घोषित करने में भी देर नहीं की। मगर उसके बाद खुद संघ प्रमुख सामने आए और मुंबई में देश के सबसे बड़े उद्योगपति के ठिकाने पर आयोजित एक कार्यक्रम में जेन ज़ी से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश की।
तवज्जो नहीं
यह अलग बात है कि उनकी यह कोशिश खास कामयाब नहीं मानी जा सकी। कार्यक्रम से पहले जेन-जी को धार्मिक बताते हुए जिस तरह के पोस्टर लगाए गए, उनसे भी यह साफ था कि संघ परिवार को जेन-जी का यह लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मिजाज रास नहीं आ रहा। इस संवाद के जरिए भी वह जेन-जी को एक नया रूप, एक नई छवि प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं जो उसके मौजूदा आंदोलनकारी चरित्र से मेल नहीं खाता। स्वाभाविक ही जेन-जी ने संघ प्रमुख की इस नई अदा को खास तवज्जो नहीं दी।
वास्तविक मूड
जेन-जी का जो वास्तविक मूड है, उसके संकेत कुछ रांची में मिले और कुछ इलाहाबाद में। खुद संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने तंज करते हुए कहा कि राहुल गांधी को इलाहाबाद नहीं, रांची जाना चाहिए था। इस तंज से भी संकेत मिलता है कि रांची में चल रहे छात्रों के विरोध को संघ परिवार जंतर-मंतर के जवाब के रूप में खड़ा करना चाहता था। मगर जंतर-मंतर आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुकी Aघ्एA की नेहा बोरा के रांची पहुंचने और खुद राहुल गांधी के आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन कर देने से मामला थोड़ा गडबड़ा गया। रही-सही कसर नेहा पर स्याही फेंकने की घटना से पूरी हो गई। इससे साफ हो गया कि संघ समर्थक खेमे को स्टूडेंट प्रोटेस्ट का स्वतंत्र स्वर बर्दाश्त नहीं है।
बेबसी और गुस्सा
इलाहाबाद का असर देखना हो तो वहां राहुल गांधी की छात्रों की गूंज कार्यक्रम के दौरान मंच से कही गई बातों पर नहीं, उसके बाद उन्हें सुनने आए स्टूडेंट्स की प्रतिक्रियाओं पर गौर करना चाहिए। अपने विषम हालात का ब्योरा देते युवाओं के चेहरे पर जो बेबसी दिख रही थी, जो गुस्सा नजर आ रहा था और राहुल गांधी के लिए जो समर्थन झलक रहा थ्ाा, उसे कम करके आंकना सत्ता के लिए आत्मघाती होगा।

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