मुख्यपृष्ठस्तंभकुंभ मेले से पहले फडणवीस सरकार के खिलाफ आर-पार की जंग!

कुंभ मेले से पहले फडणवीस सरकार के खिलाफ आर-पार की जंग!

-नासिक में संतों का फूटा गुस्सा

आगामी नासिक-त्र्यंबकेश्वर महाकुंभ से ठीक पहले सनातन धर्म के सबसे बड़े संतों और महामंडलेश्वरों के सब्र का बांध टूट गया है। महाराष्ट्र की राजनीति और धार्मिक गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब देश के शीर्ष अखाड़ा परिषद और प्रमुख साधु-संतों ने तत्कालीन उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और राज्य प्रशासन के खिलाफ सीधे युद्ध का एलान कर दिया। संतों के इस कड़े रुख से सरकार के हाथ-पांव फूल गए हैं।
‘नौकरशाही का तांडव, संतों का अपमान!’
संत समाज का सबसे बड़ा और गंभीर आरोप यह है कि कुंभ मेले की पूरी कमान ऐसे नौकरशाहों के हाथों में सौंप दी गई है, जिन्हें सनातन परंपराओं, शाही स्नान के नियमों और अखाड़ा व्यवस्था का ‘अ’ भी नहीं पता। संतों का साफ कहना था कि फडणवीस सरकार में अफसरशाही इस कदर हावी हो चुकी है कि धार्मिक पैâसलों में अखाड़ा परिषद की राय तक नहीं ली जा रही। संतों ने सीधा अल्टीमेटम दिया, ‘यह आस्था का कुंभ है, किसी अफसर का सरकारी पिकनिक स्पॉट नहीं!’
जमीन आवंटन और सुविधाओं के नाम पर सिर्फ छलावा?
लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं और हजारों साधुओं के रुकने के लिए बनने वाले ‘साधु ग्राम’ का काम बेहद सुस्त रफ्तार से चल रहा है। जमीन आवंटन, पानी, बिजली, शौचालय और सुरक्षा जैसे प्राथमिक इंतजामों को लेकर सिर्फ बैठकों का दौर जारी रहा, लेकिन धरातल पर शून्य काम देखकर महंतों का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। अखाड़ों ने चेतावनी दे डाली कि अगर व्यवस्था समय पर पूरी नहीं हुई, तो वे शाही स्नान का बहिष्कार करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
गोदावरी मैली, रामकुंड बदहाल, कहां गया बजट?
रामकुंड की सफाई और गोदावरी नदी में गिरते सीवेज के गंदे पानी को रोकने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा। संतों ने तीखे लहजे में सवाल उठाया कि कुंभ मेले के नाम पर स्वीकृत करोड़ों रुपए का बजट आखिरकार कहां जा रहा है? जब पवित्र नदी ही प्रदूषित रहेगी तो साधु-संत और श्रद्धालु किस जल में डुबकी लगाएंगे?
सरकार में खलबली, बैकफुट पर आए अफसर
अखाड़ा परिषद के इस अचानक और कड़े रुख ने फडणवीस सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। साधु-संतों के इस अल्टीमेटम के बाद मंत्रालय से लेकर नासिक प्रशासन तक हड़कंप मच गया। संतों के गुस्से को शांत करने के लिए आनन-फानन में बैठकों का दौर शुरू किया गया और विशेष समितियों का गठन कर काम तेजी से पूरा करने के वादे किए गए। लेकिन सवाल अब भी वही है, क्या संतों का यह गुस्सा शांत हो पाएगा?

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