मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य: भक्ति के नयका दौर यानी सेल्फी भक्ति..!

भोजपुरिया व्यंग्य: भक्ति के नयका दौर यानी सेल्फी भक्ति..!

प्रभुनाथ शुक्ल / भदोही

अरे भाई, जमाना बड़ा बदल गइल बा! पहिले भगवान के भक्ति में लोग घंटा-घड़ियाल बजावत रहलें, माथा टेकत रहलें, माला जपत रहलें। अब भक्ति के साथ मोबाइल भी जरूरी हो गइल बा। आजकल एगो नयका भक्ति के दौर चल रहल बा सेल्फी भक्ति!
पहिले नवधा भक्ति के बड़ा महिमा रहे। अब समय के साथ भक्त लोग एहमें एगो अउर भक्ति जोड़ दिहलस उ दसवीं भक्ति यानी सेल्फी भक्ति। अब कहीं मंदिर में जाइए, घाट पर जाइए, सावन में भोलेनाथ के जल चढ़ावे जाइए, पहिले दर्शन कम, कैमरा ऑन ज्यादा होला।
भक्त जी गंगा जी से जल भरले, भोलेनाथ पर चढ़वले आ तुरंत मोबाइल निकाल के कहले रुकऽ, पहिले एगो रील बन जाव!’ पीछे से मंदिर के घंटी बजत बा, सामने भोले बाबा विराजमान बाड़ें आ भक्त जी कैमरा में अपना चेहरा खोजत बाड़ें। जलाभिषेक भले पांच सेकेंड के होखे, लेकिन सेल्फी के एंगल दस मिनट तक खोजल जाला।
अब त हद ई बा कि भगवान के सामने भी भक्त लोग ‘सेल्फी मोड’ में खड़ा हो जात बा। माथा पर चंदन, गले में माला, हाथ में पूजा के थाली आ मोबाइल कैमरा सामने, चेहरा पर अइसन मुस्कान, जइसे भोले बाबा दर्शन ना, फोटो खिंचावे खातिर खुदे बोलवले होखीं!
भाई, ई सेल्फी भक्ति मंदिर तक सीमित नइखे। भोजन के थारी परोसल गइल, पहिले भगवान के भोग ना, मोबाइल के कैमरा के भोग! प्लेट में पूड़ी-सब्जी सजल बा, बाकिर भक्त जी तबले ना खइहें जबले ओकर फोटो सोशल मीडिया पर ना चढ़ जाई। बेडरूम से लेके बाजार तक, शादी से लेके श्मशान तक, यात्रा से लेके पूजा-पाठ तक, हर जगह सेल्फी भक्ति के जलवा बा। आजकल त लोग भगवान से प्रार्थना कम आ फॉलोअर से उम्मीद ज्यादा रखत बा। बाकि मजाक-मजाक में एगो बात जरूर बा, भक्ति दिल से होखे त भगवान कैमरा के जरूरत नइखे समझत। भगवान के सामने फोटो खिंचवला से ज्यादा जरूरी बा कि मन के तस्वीर साफ होखे।
त चलऽ भाई, नवधा भक्ति में दसवीं भक्ति जोड़ दिहल जाव, ‘सेल्फी भक्ति।’
बस एगो निवेदन बा, सेल्फी जरूर लऽ, रील जरूर बना, बाकि भगवान के दर्शन के टाइम मोबाइल के कैमरा ना, मन के कैमरा ऑन करऽ!
!!समाप्त!!

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