मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : खतरे की घंटी सुन रहे हैं साहेबान?

प्रणवाक्षर : खतरे की घंटी सुन रहे हैं साहेबान?

प्रणव प्रियदर्शी

दावे तो कोई भी कैसे भी कर सकता है। खासकर पिछले करीब डेढ़ दशकों में बड़बोलेपन को जो राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली है, उसे देखते हुए गुंडा प्रवृत्ति का कोई महत्वाकांक्षी युवक किसी भी दिन उठकर बड़े-बड़े दावे करने लग जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। ऐसे युवाओं के वीडियो हमें जब-तब सोशल मीडिया पर दिखते भी रहते हैं। लेकिन स्वतंत्र भारद्वाज नाम के शख्स का मामला इन सबसे अलग है। जो बात इस व्यक्ति के दावों को खास बनाती है, वह है मौजूदा परिस्थितियों और तथ्यों से इनका गहरा जुड़ाव।
सादी वर्दी के गुंडे
स्वतंत्र भारद्वाज ने दावे बाद में किए, उससे पहले जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के दौरान ही पूरा देश यह देख चुका था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के साथ मिलकर सादी वर्दी के गुंडे कैसे जुल्म ढा रहे थे। उसी दिन से पुलिस और गृह मंत्रालय से यह पूछा जा रहा है कि आखिर ये लोग कौन थे और पुलिसकर्मियों तक इनकी पैठ कैसे हो गई? दिल्ली पुलिस ने अब तक इस बारे में मुंह नहीं खोला है। केंद्रीय गृहमंत्री भी मुंह में दही जमाए बैठे हैं। लेकिन स्वतंत्र भारद्वाज ने सारे भेद खोल दिए।
‘बड़े भाइयों’ का वरदहस्त
उसने सीना ठोकते हुए कहा कि प्रदर्शन में शामिल एक वृद्ध व्यक्ति का उसने सिर फाड़ दिया और यह भी कि उस पर हत्या के प्रयास का मामला बनता था। लेकिन कपिल मिश्रा, चिराग पासवान और नरेंद्र मोदी जैसे ‘बड़े भाइयों’ के वरदहस्त की बदौलत वह थाने से ही सकुशल बाहर आ गया। उसके मुताबिक लोगों को यह पता होना चाहिए कि वह एक दिन के लिए भी जेल नहीं गया, खुला घूम रहा था।
एक दिन की हिरासत
सोशल मीडिया पर इन कथित बड़े भाइयों के साथ की उसकी तस्वीरें तो मौजूद हैं ही, पुलिस का रवैया भी उसके दावों की पुष्टि कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी तो २०१४ से ही सोशल मीडिया के ऐसे लंपट तत्वों के मुख्य संरक्षक बने दिख रहे हैं। वे खुलेआम ऐसे तत्वों को फॉलो करते हैं। ऐसे में अगर स्वतंत्र भारद्वाज के पॉडकास्ट का वीडियो वायरल होने और संसद मार्ग पुलिस पर कार्रवाई का दबाव बनाए जाने के बाद भी उसके खिलाफ मामूली कार्रवाई ही की गई, पुलिस हिरासत भी सिर्फ एक दिन की मांगी गई, तो आश्चर्य कैसा।
अति आत्मविश्वास
बहरहाल, सवाल यह है कि क्या स्वतंत्र भारद्वाज ने अति आत्मविश्वास में आकर मोदी सरकार की उस नीति का समय से पहले पर्दाफाश कर दिया है, जिस पर वह गुपचुप अमल करती रहना चाहती थी? आखिर दिल्ली में पुलिस कार्रवाई के दौरान सादी वर्दी वाले गुंडों का इस्तेमाल कोई पहली बार नहीं हुआ है। जंतर-मंतर प्रोटेस्ट से पहले सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन के दौरान जामिया के स्टूडेंट्स के खिलाफ भी इन गुंडों ने बर्बरता दिखाई थी। उसके बाद जेएनयू में भी ऐसे ही गुंडे पता नहीं कहां से घुस आए थे, जो मुंह पर कपड़े बांधकर स्टूडेंट्स और टीचर्स के खिलाफ घंटों हिंसा करते रहे थे।
होम्योपैथी दवा
जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के बाद तो खास बात यह भी हुई कि खुद प्रधानमंत्री ने लालकिले से देश को संबोधित करते हुए ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र किया। इसी ५ सितंबर को डीयू के श्रीराम कॉलेज
ऑफ कॉमर्स में अपने संबोधन के दौरान भी पीएम मोदी ने वह बात दोहराई। उन्होंने कहा, ‘मैंने लालकिले से होम्योपैथी दवा दी थी-दिमागी नक्सल। इसके बाद सारे दिमागी नक्सल निकल-निकल कर बाहर आ गए।’ उन्होंने कहा, ‘आप जानते हैं होम्योपैथी का स्वभाव है कि इसे लेते ही शुरुआत में लक्षण बढ़ जाते हैं। उसके बाद इलाज शुरू होता है।’
क्या है वृहत योजना
सवाल है कि क्या स्वतंत्र भारद्वाज जैसे युवा कथित दिमागी नक्सलों के इलाज की प्रधानमंत्री मोदी की वृहत योजना का हिस्सा हैं? भले किरेन रिजिजू ने शुरू में यह कहकर मामले को संभालने का प्रयास किया कि दिमागी नक्सल से मतलब विरोधी नेताओं से नहीं है, लेकिन उसके बाद सत्तारूढ़ पक्ष के अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग मौकों पर इस विशेषण का जिस बहुतायत से इस्तेमाल किया उससे स्पष्ट हो गया कि दिमागी नक्सल का मतलब उन सब लोगों से है, जो सरकार के लिए असुविधाजनक माने जाएंगे।
फैसले की घड़ी
ऐसे में लोकतांत्रिक विरोध के खिलाफ संगठित हिंसा का खतरा एक प्रबल संभावना के रूप में आ खड़ा हुआ है। ऐसा खतरा जब भी घटित होता है, वह लोकतांत्रिक समाज और शासन व्यवस्था का सत्व हरण कर लेता है। जाहिर है, विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष के अंदर भी जो लोकतांत्रिक मिजाज के लोग हैं, उनके लिए पैâसले की घड़ी अब ज्यादा दूर नहीं रह गई है। उन्हें मालूम होना चाहिए कि अभी चूके तो फिर लंबे समय तक लोकतंत्र को कोई पानी पिलाने वाला भी शायद ही मिले।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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