-१५ अगस्त से देश खोज रहा था, निशु आजाद के आरोपों ने दे दिया नया ‘पता’
-सवाल; घर के बाहर भीड़, नारे और कथित पत्थरबाजी हो तो दिल्ली पुलिस किसका इंतजार करती है?
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
१५ अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के राजनीतिक शब्दकोश में एक नया शब्द जोड़ा, ‘दिमागी नक्सली’। बस फिर क्या था! आजादी के बाद शायद ही किसी ‘अदृश्य प्रजाति’ की ऐसी राष्ट्रीय स्तर पर तलाश हुई हो। सत्ता पक्ष अपने चश्मे से खोज रहा था, विपक्ष अपने चश्मे से, टीवी स्टूडियो में बहस चल रही थी और सोशल मीडिया पर हर दूसरा आदमी तीसरे को ‘दिमागी नक्सली’ साबित करने में जुटा था। लेकिन सवाल वही था, आखिर यह दिमागी नक्सली दिखता कैसा है?
छात्रों के बीच फिर ‘दिमागी नक्सल’!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एसआरसीसी के शताब्दी समारोह में छात्रों के सामने एक बार फिर ‘दिमागी नक्सल’ शब्द दोहराया। मोदी ने कहा कि लाल किले से उन्होंने इसकी ‘होम्योपैथिक गोली’ दी थी और अब सारे दिमागी नक्सल बाहर आ गए। सवाल यह है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेजों में से एक के छात्रों के सामने रोजगार, फीस, शिक्षा की गुणवत्ता, रिसर्च और युवाओं के भविष्य पर गंभीर संवाद होना चाहिए था या राजनीतिक विरोधियों के लिए नए लेबल गढ़े जाने चाहिए थे? सीजेपी ने भी इसी मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरते हुए कहा है कि युवाओं को उम्मीद चाहिए, ‘लेबल’ नहीं।
कटघरे में दिल्ली पुलिस की भूमिका
अब निशु आजाद की ओर से लगाए गए आरोपों ने इस बहस को नया व्यंग्यात्मक मोड़ दे दिया है। यदि उनके आरोपों को आधार मानें तो शायद ‘दिमागी नक्सली’ कहीं जंगल में छिपा कोई रहस्यमय चेहरा नहीं, बल्कि वह भीड़ भी हो सकती है जो किसी के घर के बाहर पहुंच जाए, जोर-जोर से नारे लगाए, खुलेआम खुद को किसी राजनीतिक दल का समर्थक बताए और माहौल को डर तथा दबाव में बदल दे।
निशु आजाद ने स्वतंत्र भारद्वाज और उनके साथ आए लोगों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनके घर के बाहर भीड़ जमा हुई, नारेबाजी की गई और पत्थरबाजी तक हुई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है, लेकिन अगर किसी नागरिक के घर के बाहर ऐसी स्थिति बनती है तो सवाल केवल भाजपा, कांग्रेस, वामपंथ या दक्षिणपंथ का नहीं रह जाता, सवाल कानून के राज का हो जाता है और यहीं दिल्ली पुलिस की भूमिका कटघरे में आती है। राजधानी में किसी आम नागरिक, पत्रकार, कार्यकर्ता या राजनीतिक विरोधी के घर के बाहर भीड़ जमा हो, धमकी जैसा माहौल बने और पुलिस केवल घटनाक्रम का दर्शक नजर आए तो फिर उसका इकबाल किस काम का? क्या कार्रवाई के लिए किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार जरूरी है? क्या पुलिस यह तय करेगी कि भीड़ किस विचारधारा की है और फिर कानून की धाराएं चुनी जाएंगी?
व्यंग्य यह है कि देश ‘दिमागी नक्सली’ की परिभाषा ढूंढ रहा था, जबकि लोकतंत्र का असली संकट शायद बहुत साधारण भाषा में सामने खड़ा है, असहमति को धमकाकर दबाना, घर तक पहुंचना और संख्या के बल पर भय पैदा करना।
अब दिल्ली पुलिस के साहस और निष्पक्षता की तलाश
अगर निशु आजाद के आरोप सही पाए जाते हैं तो प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सली’ वाले शब्द की राजनीतिक व्याख्या चाहे जो हो, जनता अपनी व्याख्या जरूर कर सकती है, वह मानसिकता जो बहस के बदले भीड़, तर्क के बदले धमकी और कानून के बदले दबाव पर भरोसा करे। अब तलाश ‘दिमागी नक्सली’ की नहीं, दिल्ली पुलिस के साहस और निष्पक्षता की होनी चाहिए।
