-शीतल अवस्थी
-भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना करें, १४ गांठों वाला अनंत सूत्र बांधकर सुख-समृद्धि की कामना करें
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा और अनंत सूत्र धारण करने का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत संकटों से मुक्ति, परिवार की उन्नति तथा सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है।
पूजन सामग्री
-भगवान विष्णु का चित्र या प्रतिमा
– कलश और स्वच्छ जल
– आम अथवा अशोक के पत्ते
– नारियल और लाल वस्त्र
– चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत
– पुष्प और तुलसीदल
– धूप, दीप और घी
– पंचामृत
– फल और मिठाई
– १४ गांठों वाला अनंत सूत्र
– नैवेद्य के लिए पूड़ी, मालपुआ अथवा अन्य मीठा पकवान
पूजा की विधि
प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा-स्थान को साफ करके पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प करें।
पूजा-स्थान पर कलश स्थापित करें। उसमें स्वच्छ जल भरकर सुपारी, अक्षत और सिक्का डालें। कलश के मुख पर पत्ते लगाकर उसके ऊपर वस्त्र में लिपटा नारियल रखें। कलश के पास भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
सबसे पहले भगवान श्रीगणेश का पूजन करें। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए उन्हें जल, पंचामृत, चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसीदल, धूप और दीप अर्पित करें। भगवान को फल, मिठाई तथा घर में बने पकवानों का भोग लगाएं।
अनंत सूत्र का पूजन
कच्चे सूत अथवा रेशम के धागे में १४ गांठें लगाकर अनंत सूत्र तैयार करें। इसे हल्दी या कुमकुम से रंगकर भगवान विष्णु के सामने रखें। प्रत्येक गांठ को चौदह लोकों और भगवान के अनंत स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
अनंत सूत्र पर चंदन, अक्षत और पुष्प चढ़ाकर निम्न मंत्र का जाप करें—
ॐ अनंताय नमः
इसके बाद भगवान से प्रार्थना करें-
अनंत संसार महासमुद्रे
मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनंतरूपे विनियोजयस्व
ह्यनंतसूत्राय नमो नमस्ते॥
पूजन के बाद पुरुष अनंत सूत्र को दाहिनी भुजा में और महिलाएं बाईं भुजा में बांधें। सूत्र बांधते समय भगवान अनंत से परिवार की रक्षा, सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
कथा और आरती
पूजन के बाद अनंत चतुर्दशी की कथा पढ़ें अथवा सुनें। भगवान विष्णु की आरती करें और पूजा में हुई भूल के लिए क्षमा मांगें। परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित करें।
व्रती दिनभर उपवास अथवा फलाहार कर सकता है। स्वास्थ्य अनुमति दे तो ही कठोर उपवास करें। शाम को पुनः भगवान का स्मरण और आरती करने के बाद व्रत का पारण किया जा सकता है।
परंपरा के अनुसार अनंत व्रत का संकल्प लेने वाले श्रद्धालु इसे लगातार १४ वर्षों तक करते हैं। अंतिम वर्ष विधिपूर्वक उद्यापन, दान और भोजन कराने का विधान बताया गया है।
विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में पूजा-विधि में थोड़ा अंतर हो सकता है। अपने कुलाचार और स्थानीय परंपरा को प्राथमिकता दी जा सकती है।
