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रेतीबंदर में रेलवे ट्रैक बना मौत का रास्ता!

-सालों से अंडरपास की मांग…आंदोलन और अनशन के बाद भी रेलवे की नींद नहीं टूटी

संदीप पांडेय / मुंबई

एक तरफ भारतीय रेलवे यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के दावे करती है, वहीं मुंब्रा के रेतीबंदर इलाके में रेलवे ट्रैक के आसपास रहने वाले नागरिक वर्षों से सुरक्षित आवाजाही के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां रेलवे लाइन पार करने के दौरान हादसों और मौतों का मुद्दा पुराना है। स्थानीय नागरिकों की मांग है कि रेलवे ट्रैक के नीचे अंडरपास/टनल बनाया जाए, ताकि लोगों को जान जोखिम में डालकर पटरी पार न करनी पड़े। लेकिन करीब दो दशक से चली आ रही इस मांग पर अब तक ठोस समाधान नहीं हो पाया है। रेलवे के अपने सुरक्षा प्रावधानों में आबादी से लगी रेलवे भूमि पर बाउंड्री वॉल तथा संवेदनशील स्थानों पर फेंसिंग जैसे उपायों का प्रावधान है, लेकिन रेतीबंदर में सुरक्षित आवाजाही और ट्रैक तक लोगों की पहुंच रोकने की व्यवस्था को लेकर सवाल कायम हैं।
२००७ से मांग, २०२५ में अनशन-रास्ता रोको आंदोलन
रेतीबंदर में रेलवे अंडरपास की मांग वर्ष २००७ से की जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, जून २०२४ में रेलवे अधिकारियों ने मानसून के बाद अक्टूबर २०२४ में काम शुरू करने का आश्वासन दिया था। काम शुरू नहीं हुआ तो १६ जनवरी २०२५ को स्थानीय नागरिकों ने अनिश्चितकालीन अनशन और रास्ता रोको आंदोलन किया। इसके बाद रेलवे अधिकारी मौके पर पहुंचे और मई २०२५ तक काम पूरा करने का आश्वासन दिया। कुछ निर्माण सामग्री मौके पर पहुंची, लेकिन काम फिर रुक गया। इसके बाद अक्टूबर २०२५ और जनवरी २०२६ की नई समय-सीमाएं भी निकल गर्इं। रेलवे की ओर से देरी का कारण मेगा ब्लॉक की मंजूरी लंबित होना बताया गया।
रेलवे के अपने रिकॉर्ड में ‘सेफ्टी जोन’
इस मामले को और गंभीर बनाता है, रेलवे का अपना रिकॉर्ड। सेंट्रल रेलवे की २०१५ की समन्वय बैठक के दस्तावेज में कलवा-मुंब्रा के बीच रेतीबंदर और राणा नगर को ‘सेफ्टी जोन’ में आने वाली झोपड़ियों के सर्वेक्षण का उल्लेख है। वर्ष २०१२ में ५वीं और ६ठी लाइन के काम के दौरान यहां झोपड़ियों का सर्वे किया गया था। रेतीबंदर में ९८ परियोजना प्रभावित व्यक्तियों के पुनर्वास की बात भी रिकॉर्ड में दर्ज है।

 

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