-प्रणव प्रियदर्शी
इंदौर में शनिवार को आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम न तो अपनी तरह का पहला आयोजन था और न आखिरी। छात्रों-युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करने की राहुल गांधी की कोशिशों के तहत कोटा से शुरू हुई इस कार्यक्रम शृंखला की यह पांचवीं कड़ी थी।
फिर भी, इस कार्यक्रम से जुड़े विभिन्न पहलुओं को लेकर समर्थक और विपक्षी दोनों खेमों में लोग उद्वेलित नजर आ रहे हैं तो यह अकारण नहीं है। लेकिन इसके कारणों पर जाने से पहले यह देख लेना बेहतर होगा कि आखिर वे कौन से बिंदु हैं, जिन पर दोनों पक्षों से आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं।
खुला खेल फर्रुखाबादी
दिलचस्प है कि आयोजन से जुड़े दो बड़े बिंदु ऐसे हैं, जिन पर सामान्य स्थिति में दोनों खेमों के बीच घोर असहमति होनी चाहिए थी, लेकिन अप्रत्याशित रूप से सहमति दिख रही है। पहला तो यह कि सत्ता पक्ष ने कार्यक्रम के आयोजन में अड़चनें खड़ी करने की भरसक कोशिश की। ये कोशिशें कमोबेश हर जगह हुर्इं, लेकिन सत्तापक्ष ने उस पर परदा डालने का प्रयास किया। इस बार ये कोशिशें इतनी बढ़-चढ़कर हुई कि कोई भी इसका खंडन करने की स्थिति में नहीं रह गया। चाहे, स्थानीय प्रशासन की ओर से परमिशन देने में आनाकानी करने का मामला हो या वरिष्ठ मंत्रियों, नेताओं और खुद मुख्यमंत्री द्वारा बयानों के माध्यम से दबाव बनाने का या फिर कोचिंग संचालकों के जरिए स्टूडेंट्स को आयोजन से दूर रखने के प्रयासों का, सब खुला खेल फर्रुखाबादी था।
डूसू चुनावों के नतीजे
दूसरा बिंदु है कार्यक्रम में पहुंची युवाओं की विशाल भीड़ का। युवा जितनी बड़ी संख्या में और जिस उत्साह के साथ राहुल गांधी के इस कार्यक्रम में आए, उसे झुठलाने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई। शायद इसीलिए सत्ता पक्ष के लोग इस कार्यक्रम में युवाओं की शिरकत पर सवाल उठाने के बजाय उसकी निरर्थकता को मुद्दा बना रहे हैं। इसमें वे सहारा ले रहे हैं डेल्ही यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स युनियन (DUSU) के चुनाव नतीजों का। उनके मुताबिक, इनमें सभी सीटों पर हुई र्एळघ् की हार बताती है कि चाहे जितने भी छात्रों की गूंज कार्यक्रम हो जाएं, जंतर मंतर पर चाहे जितने भी धरने-प्रदर्शन हो जाएं, युवा शक्ति आज भी नरेंद्र मोदी के साथ है।
सुर में मिलते सुर
दिलचस्प बात है कि कांग्रेस समर्थक माना जाने वाला उदार बुद्धिजीवियों का भी एक तबका इस मुद्दे पर उनके सुर में सुर मिलाता दिख रहा है। उसका कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व छात्रों की गूंज जैसे कार्यक्रमों पर जितना ध्यान दे रहा है, उतना चुनाव लड़ने और जीतने पर नहीं दे रहा। उसके बड़े नेता समय रहते यह नहीं देख पाए कि एनएसयूआई अपने सबसे समर्थ प्रत्याशी को टिकट से वंचित कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। आखिर वह प्रत्याशी निर्दलीय खड़ा हुआ और जीत गया।
मसखरे को मंच
ऐसे ही आलोचना का दूसरा स्वर, जिसे दोनों खेमों से समर्थन मिल रहा है, वह है कार्यक्रम की प्रस्तुति में हुई कथित गड़बड़ियों का। एक बात तो उठ रही है कोऑर्डिनेशन की कमी की। कहा जा रहा है कि राहुल बोल ही रहे होते थे कि युवाओं का ग्रुप मंच पर पहुंच जाता था। ज्यादा गंभीर आलोचना के तौर पर यह कहा जा रहा है कि मसखरों को बुलाकर इस मंच को सस्ता बना दिया गया। ध्यान रहे, राहुल गांधी के कार्यक्रम के दौरान स्टैंडअप कॉमेडियन पुलकित मनि मंच पर आए थे और अपनी जानी-पहचानी शैली में नरेंद्र मोदी की मिमिक्री की थी।
कमियां कम नहीं
वैसे तो देश में जिस तरह का विभाजित राजनीतिक माहौल बना हुआ है, उसे देखते हुए सत्तापक्ष और विपक्ष के दोनों धड़ों से सहमति के सुर सुनाई देना अच्छी बात ही मानी जानी चाहिए। लेकिन अगर राहुल गांधी के कार्यक्रम की सार्थकता को चुनाव नतीजों की कसौटी पर कसा जाने लगे तो निष्कर्ष क्या मिलेगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। भूलना नहीं चाहिए कि विपक्ष की सबसे बड़ी शिकायत ही यह है कि चुनाव धांधली के बल पर जीते जा रहे हैं। लेकिन इसके अलावा भी काबिल उम्मीदवार चुनने से लेकर सही मुद्दे उठाने और समर्थकों को बूथ तक पहुंचाने जैसे तमाम बिंदुओं पर कांग्रेस की दर्जनों कमियां गिनाई जा सकती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती
सवाल, मगर यह है कि इन सबसे सत्ता में बैठी पार्टी की गलत नीतियां, उसकी आपराधिक लापरवाहियां सही वैâसे हो जाएंगी? युवाओं का इन सबसे उपजा आक्रोश गायब वैâसे हो जाएगा? क्रांतिकारी कवि पाश की पंक्तियां हैं, ‘लड़ने का ढंग न हुआ लड़ाई की जरूरत होगी।’ आज के राहुल गांधी इन पंक्तियों को चरितार्थ कर रहे हैं। वे लड़ने के ढंग का नहीं, लड़ाई की जरूरत का प्रतिनिधि चेहरा बने हुए हैं। उनसे जुड़ रहा युवा इस बात को समझ रहा है और यही, सत्ता पक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)
