इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने देश के स्कूलों में बुर्का और नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने तथा प्रति कक्षा विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने के लिए नए कानून का प्रस्ताव देने का एलान किया है। इसके साथ ही, गंभीर भाषाई समस्याओं वाले विदेशी छात्रों के अभिभावकों के लिए इटैलियन भाषा सीखना अनिवार्य किया जाएगा।
रिसर्च इंस्टीट्यूट ISMU के मुताबिक, इटली के स्कूलों में लगभग ११.६ प्रतिशत बिना नागरिकता वाले विदेशी छात्र हैं। हालांकि, ३० प्रतिशत सीमा का नियम पहले से था, पर व्यावहारिक रूप से इसे लागू करना कठिन रहा है। फिलहाल, यह प्रस्ताव कैबिनेट व संसद की मंजूरी के इंतजार में है, इसलिए देशव्यापी बैन अभी लागू नहीं हुआ है।
इसके मायने और पड़ने वाले प्रभाव
सांस्कृतिक एकीकरण व राष्ट्रीय पहचान
मेलोनी की राइट-विंग ‘ब्रदर्स ऑफ इटली’ सरकार का मानना है कि प्रवासियों को देश के सामाजिक नियमों और भाषा को अपनाना चाहिए। यह कदम इटैलियन संस्कृति और भाषा को प्राथमिकता देने की नीति को दर्शाता है।
यूरोपीय नीतियों से तालमेल
फ्रांस और बेल्जियम जैसे देश पहले ही सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने पर रोक लगा चुके हैं, जिसे यूरोपीय मानवाधिकार अदालत ने भी बरकरार रखा था। इटली का यह पैâसला यूरोप के इसी दक्षिणपंथी और सख्त एकीकरण मॉडल से मेल खाता है।
शिक्षा व्यवस्था पर असर
कक्षाओं में विदेशी छात्रों की सीमा तय करने से शिक्षकों को भाषा सिखाने में आसानी हो सकती है, लेकिन जनसांख्यिकीय चुनौतियों वाले इलाकों में छात्रों का संतुलन बनाना मुश्किल साबित होगा।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम मानवाधिकार पर बहस
मानवाधिकार संगठनों और मुस्लिम समुदाय का तर्क है कि ऐसे प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों को सीमित करते हैं, जिससे अलगाव बढ़ सकता है।
यह कदम इटली में सुरक्षा, एकीकरण और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच लंबे समय से जारी बहस को नया मोड़ देता है।
