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मुस्लिम वर्ल्ड : ट्रंप के तेवर ठंडे पड़े या तूफान से पहले की शांति?

-सूफी खान
नवंबर में ईरान पर फिर अमेरिका हमला कर सकता है। इजरायल में अक्टूबर के इलेक्शन के बाद और अमेरिका में मिडटर्म से पहले ईरान पर एक और तगड़े हमले की अटकलें लगने लगी हैं। ईरान भी तैयार है, दावा किया जा रहा है कि उसका पलटवार तबाहकुन होगा। लेकिन इस बीच ये खबरें भी आना शरू हो गई हैं कि एक बार फिर नया सिलसिला शरू हुआ है। दरअसल, अमेरिका के न्यूयार्क में यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली की अहम मीटिंग हो रही है और इससे पहले ट्रंप को मजबूरन ही सही झुकना पड़ा है। अब प्रेसिडेंट ट्रंप की धौंस गायब है और ईरान ने भी एक कदम आगे बढ़ते हुए कुछ टेढ़ी शर्तें हटा दी हैं। दोनों ही पक्ष अब एक पॉजिटिव कदम की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं। ईरान ने इस बात से साफ इंकार किया है कि अमेरिका की उसके साथ कोई सीधी बातचीत चल रही है। लेकिन बताया जा रहा है कि ईरान ने कतर के जरिए कुछ जवाब अमेरिका को भेजे हैं, जिनमें कुछ शर्तें रखी गई हैं और एक शर्त में ढील भी दी गई है। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि ईरान ने वो शर्त हटा दी है, जिसमें कहा गया था कि हमें जंग का हर्जाना देना होगा। ४० दिनों जंग में हुए नुकसान का हर्जाना अमेरिका को भरना पड़ेगा। अब इस शर्त में ईरान की तरफ से ढील दे दी गई है। जाहिर सी बात है कि अमेरिका कभी हर्जाना देता भी नहीं तो ईरान का अड़ने का कोई मतलब नहीं था। ईरान अपनी पुरानी शर्तों पर अब भी कायम है कि जंग रोक दी जाए। ईरान का विदेशों में सीज पैसा लौटाया जाए। ईरान की समुद्री नाकेबंदी खत्म की जाए, यानी अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर जो नेवल ब्लॉकेट लगाया है उसे खत्म किया जाए।
इतना ही नहीं, अमेरिका ने भी ईरान के लिए एक ढील दी है। न्यूयार्क में यूएन की जो बैठक चल रही है, इसके लिए अमेरिका ने ईरान के प्रेसिडेंट मसूद पजेश्कियान और फॉरेन मिनिस्टर अब्बास अरागची को वीजा जारी कर दिया है, ताकि वो अमेरिका आकर इस मीटिंग में हिस्सा ले सकें। हालांकि, ये संयुक्त राष्ट्र के नियमों के आधार पर किया गया है कि भले ही मुख्यालय अमेरिका में हो, लेकिन अमेरिका अपने दुश्मनों को भी न्यूयार्क आने से रोक नहीं सकता। हां, उन्हें कुछ ही स्थानों तक सीमित जरूर कर सकता है। देखा जाए तो ईरान के सुप्रीम लीडर ने एक तरफ तो प्रेसिडेंट पजेश्कियान और अब्बास अरागची को दुनिया के मंच पर अपनी बात रखने और बातचीत के दरवाजे खुले रखने की छूट दी हैं, वहीं दूसरी ओर आईआरजीसी या पासदाराने इस्लाम को हिदायत दे रखी है कि अमेरिका और इजरायल को टाइट करके रखो। अब देखना होगा कि यूएन की बैठक में पहुंच रहे अरब मुल्कों की राय क्या बनती है। मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात पर क्या वो ईरान के साथ मिलकर रहना चाहते हैं और अपने मसले खुद सुलझाना चाहते हैं या फिर बेगानी शादी में अमेरिका को अब्दुल्ला दीवाना बनाना चाहते हैं। यूएन की बैठक से पहले ही ईरान ने पिछले दिनों एक अहम पहल की थी, उसने ओमान और अरब देशों से कहा था कि आओ मिल बैठकर होर्मुज को मैनेज कर लेते हैं और बाहरी ताकतों को इसमें दखल नहीं देने देते हैं, यही बात यूएन की बैठक में रखते हैं। हालांकि, ईरान के उस प्रस्ताव पर अमेरिका के करीबी सऊदी अरब ने अड़ंगा लगा दिया और उसे टलवा दिया। लेकिन अब देखना होगा कि ईरान और अमेरिका जिस तरह से एक-दूसरे के लिए कुछ रियायत बरत रहे हैं, वो उन्हें क्या फिर बातचीत की टेबल तक ले आएगी या इजरायल और अरब देश अमेरिका को नई पट्टी पढ़ाकर फिर एक बार ईरान के साथ जंग में झोंकेंगे?

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