-राहुल की नागरिकता पर बार-बार याचिका
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ पुराने मामलों के बार-बार अदालत पहुंचने से सवाल उठ रहा है-यह सामान्य कानूनी प्रक्रिया है या विपक्ष को लगातार आरोपों में उलझाए रखने की रणनीति? दिल्ली की सत्र अदालत ने सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर की मांग वाली शिकायत खारिज करने का मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया है। शिकायत में आरोप है कि भारतीय नागरिकता मिलने से लगभग तीन वर्ष पहले, १९८० में ही सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो गया था। हालांकि, अदालत ने न तो आरोप सही माना है और न ही एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। अदालत ने केवल यह कहा कि मजिस्ट्रेट ने शिकायत खारिज करते समय पर्याप्त कारण नहीं बताए और न्यायिक विवेक का समुचित इस्तेमाल नहीं किया। मामला दोबारा सुनवाई के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेजा गया है। अब सवाल है कि ४६ वर्ष पुराने मामले में मूल आवेदन, दस्तावेज और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका कैसे निर्धारित होगी? यदि गलत एंट्री हुई थी तो तत्कालीन निर्वाचन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। दूसरी ओर राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता का आरोप भी वर्षों से अलग-अलग अदालतों में उठाया जा रहा है।
इसके बावजूद किसी अंतिम न्यायिक निर्णय ने उन्हें ब्रिटिश नागरिक घोषित नहीं किया है। जांच से किसी को छूट नहीं मिलनी चाहिए, लेकिन एक ही आरोप को बार-बार उठाकर वर्षों तक संदेह बनाए रखना भी उचित नहीं। आरोप सही हैं तो समयबद्ध जांच करके दोष तय हो; निराधार हैं तो मामला समाप्त किया जाए। लोकतंत्र में कानूनी प्रक्रिया न्याय का माध्यम होनी चाहिए-राजनीतिक सजा का नहीं।
