प्रमोद भार्गव
खगोलविदों ने पहली बार सौरमंडल के बाहर एक ग्रह से सीधे रेडियो संकेतों का पता लगाया है। इससे पृथ्वी के बाहर जीवन की संभावना वाले ग्रह को लेकर नई उम्मीद जगी है। हालांकि, अभी तक पृथ्वी के बाहर किसी और जीवन का कोई साक्ष्य नहीं मिला है, किंतु वैज्ञानिक लगातार ऐसे संकेतो की खोज में हैं, जिनसे पता चल सके कि ब्रह्मांड में पृथ्वी की तरह दूसरा ग्रह है और उस पर भी लोग रहते हैं। हालांकि, ऐसी नई खोजों से दूसरी पृथ्वी पर मानव आबादी होने की उम्मीद तो बंधती है, लेकिन अंततः ये खोजें एलियन के अस्तित्व तक सिमटकर रह जाती हैं। एलियन का भी कोई अस्तित्व है, इसके भी कोई ठोस प्रमाण अभी तक नहीं मिल पाए है। यह खोज परग्रही (एलियन) जीवन मिलने का संकेत तो नहीं है, लेकिन इन संकेतों से किसी ग्रह (एक्सोप्लैनेट) से आने वाले रेडियो उत्सर्जन की पुश्टि जरूर की गई है।
दक्षिण अफ्रीका के मीरकैट रेडियो टेलीस्कोप से करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित गैस दानव ग्रह यानी ‘बीटा पिक्टोरिस बी‘ से रेडियो संकेत दर्ज किए गए हैं। हार्वर्ड और स्मिथसोनियन के सेंटर फाॅर एस्ट्रोफिजिक्स तथा एक्सोप्लेनेट विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इन रेडियो संकेतों को खोजा है। इन्हें एलियन के संकेत इसलिए नहीं माना जा रहा है, क्योंकि ये सीधे एक्सोप्लैनेट आॅरोरा (ध्रुवीय प्रकाश) से आए हैं। ये पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ऊपरी वायुमंडल में दिखने वाली रंग-बिरंगी प्राकृतिक रोषनी होती है। ये चार्जड् पार्टिकल्स (आवेषित कण) के वायुमंडलीय चुंबकीय क्षेत्र को तारकीय विकिरण से किस हद तक बचा पाते हैं और किन ग्रहों में जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां दीर्घकाल तक बनाए रख पाते हैं, यह ज्ञात करने की उम्मीद बंधी है।
सौरमंडल में गुरु, शनि, यूरेनस और नेपच्यून जैसे विषाल गैस दानव ग्रह तरंगे उत्सर्जित करते है, इनमें गुरू ग्रह हमारे सौरमंडल का सबसे षक्तिषाली रेडियो स्रोत है। इन ग्रहों से निकले संकेतों का अध्ययन से वैज्ञानिकों को चुबंकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी मिल जाती है। साथ ही धु्रवों से रोषनी कैसे बनती है, यह पता भी चलता है। जब किसी तारे से ऊर्जावान आवेषित कण निकालते हैं तो वे ग्रह के चुबंकीय क्षेत्र से प्रभावित होते हैं। जब आवेषित कण वायुमंडल के कणों से टकराते हैं, तब दोनों धु्रवों पर एक ज्योति प्रज्जवलित होती सी दिखाई देती है, इसी समय रेडियो संकेतों का उत्सर्जन संभव होता है। यह जानकारी ‘डिस्कवरी ऑफ रेडियो इमिषन फ्राम एक्सोप्लैनेट बीटा पिक्टोरिस बी‘ शोधपत्र से सामने आई है।
अंतरिक्ष से आने वाले रेडियो संकेत वैज्ञानिकों के लिए हमेशा ही विस्मय का कारण बने हैं। इसके पहले वैज्ञानिकों ने पहली बार किसी ऐसे रेडियो संकेत को सुना था, जो एक निश्चित अवधि के अंदर बार-बार आ रहा था। वैज्ञानिकों ने इसे ‘फास्ट रेडियो बस्र्ट‘ (एफआरबी) यानी ‘तीव्र रेडियो प्रस्फोट‘ नाम दिया हुआ है। ब्रिटिष कोलंबिया और आस्ट्रलिया नेषनल साइंस आॅर्गेनाइजेषन में ये प्रयोग चल रहे हैं। यह संकेत 16.35 दिन में मिले थे। 10 सेकेंड तक मिलते रहने वाले इस संकेतो के साथ दो चीजें अनूठी रही थीं, एक तो अंतरिक्ष से आने वाला पहला ऐसा रेडियो संकेत था, जिसकी एक निष्चित अवधि के बाद पुनरावृत्ति हो रही थी। दूसरे, यह अंतरिक्ष के बाहरी भाग में स्थित किसी स्रोत से आ रहा था, जो धरती के बहुत करीब माना गया था। हालांकि, 1972 में पहला रेडियो संकेत मिलने का दावा रसियन अखबार ‘प्रावदा‘ ने किया था। उसके बाद मिलने वाले पांच ऐसे संकेत हैं, जिन्हें बाकायदा रिकाॅर्ड किया गया है। पहला, वाओ नामक संकेत 72 सेकेंड तक मिला था। दूसरा, एसएचजीबी-0$40ए संकेत है। तीसरा, एचडी-164595 रेडियो संकेत सूर्य के पास स्थित किसी सितारे से आया था। चैथे, रेडियो संकेत को काॅस्मिक राॅर अर्थात अंतरिक्ष की दहाड़ नाम दिया गया है। पांचवां संकेत एफआरबी 180924, छठा एफआरबी 180916 और सातवां एफआरबी 190523 है। दो अन्य संकेत भी मिले हैं, जो एफआरबी की कड़ियों में ही गिने गए हैं। अंतरिक्ष की एक विलक्षणता यह है कि वहां हवा नहीं होती है। इसलिए ध्वनि अर्थात आवाज एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जाती है। लेकिन तरंगें आ-जा सकती हैं।
एफआरबी की पहचान 2007 में खगोलविज्ञानी डंकन लोरीमर एवं डेविड नारकेविक ने पल्सरों के अध्ययन के दौरान की थी। इस वजह से इन्हें ‘लोरीमर प्रस्फोट‘ भी कहा जाता है। अब तक वैज्ञानिकों ने दो तरह के एफआरबी का पता लगाया है। एक तो वे एफआरबी हैं, जिनसे एक ही बार रेडियो संकेत छोड़ा जाता है और दूसरे वह हैं, जो बार-बार अपने स्रोत से छोड़े जाते हैं। वैज्ञानिक टेवनी ने चार फरवरी 2020 को बार-बार आने वाले रेडियो संकेत का नाम एफआरबी-180916 दिया है। इस संकेत के विश्वसनीय स्रोत का फिलहाल पता नहीं चला है। नतीजतन कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि कृश्ण विवर (ब्लैक हाॅल) से यह संकेत आता है। ऐसा अनुमान है कि जिस स्रोत से यह संकेत निकलता है, वह अपने अक्ष पर 16.35 दिनों में एक बार घूमता होगा। इसलिए प्रत्येक 16.35 दिन में यह संकेत मिल रहा है। वहीं कुछ वैज्ञानिक इसके एलियन से संबंध होने की भी आशंका जता रहे हैं। उनका मानना है कि एलियन की ओर से ये संकेत पृथ्वी पर भेजे जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का अंदाज है कि एफआरबी धरती से 50 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर स्थित तारामंडल के बाहरी हिस्से से आता है। सितंबर 2018 से अक्टूबर 2019 के बीच वैज्ञानिकों ने रेडिया दूरबीन से एफआरबी की निगरानी करने पर पाया कि ये संकेत लगातार चार दिनों तक अनुभव किए जाते हैं और फिर 12 दिन तक गायब रहते हैं। इस तरह 16.35 दिनों की अवधि के बाद ये संकेत फिर लौट आते हैं। कुछ वैज्ञानिक इन्हें धूमकेतुओं से उत्सर्जित होना भी मान रहे हैं।
इन संकेतों का स्रोत एलियन अर्थात पराग्रही हैं तो यह प्रष्न स्वाभाविक है कि ब्रह्माण्ड के असीम विस्तार में पृथ्वी के अलावा भी जीवन की संभावनाएं हैं। हमारे ही नहीं विश्व के प्रत्येक प्राचीन धर्म की पौराणिक कथाओं में सुदूर ग्रह या लोकों के देवताओं के पृथ्वी पर आने-जाने का उल्लेख मिलता है। इन पौराणिक कथाओं के शाब्दिक अर्थों के प्रकाश में उनकी तार्किक उपस्थिति की पड़ताल के लिए वैज्ञानिक सक्रिए हुए हैं। एलियंस के आ रहे चित्रों, विज्ञान-कथाओं व फिल्मों में जीवंत पात्र की भूमिका ने इसकी एक काल्पनिक छवि हमारी स्मृति में उकेर दी है। इनके अस्तित्व और मानव सभ्यता पर इसके प्रभाव को लेकर शोध निरंतर जारी हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाॅकिंग ने एलियंस से संपर्क नहीं करने की चेतावनी दी थी। उन्होंने इन्हें पृथ्वी के मानव अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बताया था। उनकी शंका थी कि एलियंस हमसे बेहतर तकनीक वाले जीव हो सकते हैं। हालांकि, कई वैज्ञानिकों ने इस आशंका को निर्मूल बताया है।
खैर, साहसी लोग षंका-कुशंकाओं की परवाह किए बिना आगे बढ़ते हैं। गोया, आज अंतरिक्ष में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन है, जो ब्रह्माण्ड की गुत्थियों को सुलझाने की कोषिष में लगा है। चंद्रमा के बाद मनुष्य मंगल पर पहुंचने का रास्ता प्रशस्त करने में लगा है। हालांकि, अभी तक जीवंत रूप में कोई पराग्रही चंद्रमा और मंगल पर सक्रिय उपग्रहों की दृष्टि में नहीं आया है और न ही मनुष्य के जीवन के जीवनदायी तत्व पानी की उपलब्धता देखने में आई है। बावजूद खगोल-विज्ञानी शक्तिशाली दूरबीनों और उपग्रहों के माध्यम से अनंत आकाश के किसी ग्रह पर मानवीय बसाहट की उम्मीद से ब्रह्माण्ड को खंगाल रहे हैं। संभव है, इसी तलाश में कोई पराग्रही जीव अंतरिक्ष में लगे कैमरे की आंख में कैद हो ही जाए ?
हालांकि तमाम जीव वैज्ञानिकों का मानना तो यहां तक है कि अतीत में सुदूर ग्रहों से परलोकीय प्राणी पृथ्वी पर आए थे और उन्होंने ही पृथ्वीवासी मनुष्य को सभ्य होने का रास्ता दिखाया था। अब हमारे पुराणों में तो जितने देवता हैं, उनका निवास परलोक ही है। इस परलोकीय स्वर्ग के राजा इंद्र हैं। जब भी कोई पराक्रमी अपने तप बल से इस लोक की ओर जाने को उद्यत होता है, तो बेचारे इंद्र का सिंहासन डोलने लग जाता है। तब परलोकवासी ब्रह्मा, विष्णु, महेश इंद्र को मदद का आश्वासन देते हैं और फिर पराक्रमी देव हों या दानव या फिर मानव उसे परलोक की ओर जाने से रोक देते हैं। देवता धरती व अन्य ग्रहों पर अपने आकाशगामी यानों से आया-जाया करते थे। हालांकि, अब अनेक परंपरागत जड़ताएं टूट रही हैं। वैज्ञानिक एलियंस की सच्चाई को समझने के लिए पराग्रही देवताओं के काल्पनिक व अविष्वसनीय से लगने वाले अस्तित्व में भी झांक रहे हैं।
(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
