मुख्यपृष्ठस्तंभशिक्षा को लेकर कब गंभीर होगी सरकार?

शिक्षा को लेकर कब गंभीर होगी सरकार?

-जब मंत्री चले जाते हैं, तब भी सिस्टम बना रहता है
-एक भारतीय शिक्षा सेवा के लिए भारत का लंबा इंतजार

शशांक राय

पेपर लीक होने का संकट। एक मंत्री का इस्तीफ़ा। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के अफसरों पर कार्रवाई। एक और सुधार समिति। ये कदम फौरी तौर पर इस संकट से निपटने के काम आ सकते हैं, लेकिन ये एक बड़ा सवाल पीछे छोड़ जाते हैं। भारतीय शिक्षा को पेशेवर तरीके से चलाने की जिम्मेदारी आख़िर किसकी होनी चाहिए?

मंत्री का इस्तीफ़ा सियासी जवाबदेही का एक जाहिर नजारा है। अफसर हटाए जा सकते हैं, एजेंसियों का ढांचा फिर से तैयार किया जा सकता है और समितियां भी बनाई जा सकती हैं। लेकिन तरकीब या बदलाव सिर्फ अफसरों को बदलने से इस ढांचागत समस्या का हल नहीं निकाल सकती। इसलिए इस बहस को ‘किसने इस्तीफ़ा दिया’ से आगे बढ़कर इस बात पर ध्यान देना होगा कि आखिर शिक्षा का इंतजाम किस तरह किया जा रहा है।
भारत को काबिल और व्यापक समझ वाले प्रशासकों की जरूरत है। लेकिन आम प्रशासनिक काबिलियत किसी खास क्षेत्र (सेक्टर) की विशेषज्ञता का विकल्प नहीं हो सकती। कोई भी इंसान किसी काबिल सर्जन को कुछ सालों के लिए रेलवे चलाने, फिर वित्त (फाइनेंस) विभाग संभालने और उसके बाद खेती-किसानी के मामले देखने के लिए भेजने का ख्याल नहीं करेगा। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह की फेरबदल लंबे समय से हमारी प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा रही है। एक अफ़सर शिक्षा विभाग में आता है, उसकी परीक्षाओं, स्कूलों, शिक्षकों, ख़रीद-फरोख्त (प्रोक्योरमेंट) और नीतियों को समझता है और जैसे ही उसमें महारत हासिल करने लगता है, उसका तबादला कहीं और कर दिया जाता है। नया आने वाला अफ़सर फिर शून्य से शुरुआत करता है। एक ऐसे क्षेत्र में जो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य गढ़ता हो, इस ढर्रे पर संजीदगी से गौर करने की ज़रूरत है।
संस्थागत संकटों पर भारत का जाना-पहचाना रवैया एक कमेटी बना देना है। परीक्षा-सुधार की ताज़ा कोशिशों में तकनीक, अंतरिक्ष, खुफिया तंत्र, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और लोक प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों को एक साथ लाया गया है। ऐसी विशेषज्ञता की अपनी अहमियत हो सकती है। लेकिन समितियाँ अस्थायी होती हैं; उन्हें लागू करने की प्रक्रिया स्थायी होती है। आख़िरकार, सिफारिशों को ही नियम, बजट, भर्ती-प्रणाली, प्रोक्योरमेंट प्रोसेस, प्रशिक्षण, निगरानी और देखभाल में बदलना होता है। इस काम के लिए ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है जो शिक्षा को एक पूरे सिस्टम के रूप में समझें, न कि सिर्फ़ एक ऐसे संकट के रूप में जिसे दूर करना हो। इसलिए बड़ा मुद्दा यह नहीं है कि कुछ गड़बड़ होने पर क्या भारत विशेषज्ञों को इकट्ठा कर सकता है या नहीं। असल सवाल यह है कि जब समिति अपना काम करके चली जाती है, तो क्या हमारे स्थायी प्रशासन के पास संकट को रोकने, उसे संभालने और सुधारों को लागू करने की पर्याप्त विशेषज्ञ क्षमता मौजूद होती है?
शिक्षा प्रशासन अब सिर्फ़ एक रूटीन दफ़्तरी या अफ़सरशाही का काम नहीं रह गया है। इसके दायरे में शिक्षा-शास्त्र (पेडागोजी), पाठ्यक्रम (करिकुलम), मूल्यांकन, बाल मनोविज्ञान, शिक्षक प्रशिक्षण, सार्वजनिक वित्त, क़ानून, ख़रीद-फ़रोख़्त, डेटा सुरक्षा और तकनीक का शासन (टेक्नोलॉजी गवर्नेंस) शामिल हैं। प्रशासक आजकल डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन परीक्षाओं, छात्र डेटाबेस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बड़े-बड़े टेक्नोलॉजी कॉन्ट्रैक्ट्स का काम संभाल रहे हैं। एक एल्गोरिदम का फैसला पूरे मूल्यांकन को प्रभावित कर सकता है। प्रोक्योरमेंट का एक फैसला करोड़ों छात्रों के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का ढांचा तय कर सकता है। डेटा से जुड़ी नीति यह तय कर सकती है कि संवेदनशील जानकारियों को कैसे इकट्ठा और सुरक्षित रखा जाए।
यह चुनौती सिर्फ़ नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे स्कूल तक पहुंचती है। “स्कूल ठीक करो” जैसी मुहिमों ने कर्मचारियों की कमी और बुनियादी ढाँचे की कमज़ोरियों को उजागर किया है। दाखिला (एनरोलमेंट) मिलना सिर्फ़ एक शुरुआत है। असली इम्तिहान तो यह है कि कक्षा (क्लासरूम) के भीतर क्या हो रहा है: क्या शिक्षक उपलब्ध हैं, क्या सुविधाएं काम कर रही हैं और क्या छात्र सचमुच कुछ सीख पा रहे हैं। इसके लिए एक ऐसे प्रशासन की ज़रूरत है जो नीति के निर्माण और क्लासरूम की जमीनी हकीकत, दोनों को बखूबी समझता हो।
भारतीय शिक्षा सेवा कोई नया विचार नहीं है
भारतीय शिक्षा सेवा का प्रस्ताव मौजूदा परीक्षा संकट से बहुत पुराना है। कोठारी आयोग ने शैक्षिक प्रशासन के पेशेवर ढांचे पर जोर दिया था। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में भारतीय शिक्षा सेवा को एक ऑल-इंडिया सर्विस के रूप में स्थापित करने की बात कही गई थी। केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए 2007 में गठित पुंछी आयोग ने भी शिक्षा में ऑल-इंडिया सर्विस की सिफारिश की थी। 2016 में, टी.एस.आर. सुब्रमण्यम समिति ने एक बार फिर ऑल-इंडिया एजुकेशन सर्विस का प्रस्ताव रखा। फिर भी इनमें से कोई भी प्रस्ताव लागू नहीं हो सका। यह इतिहास एक सीधा सा संस्थागत सवाल खड़ा करता है: बार-बार अलग-अलग सुधार अभियानों में सिफारिश किए जाने के बावजूद यह विचार कभी कागज़ों से निकलकर हकीकत क्यों नहीं बन पाया?
अगर भारतीय शिक्षा सेवा का गठन किया भी जाता है, तो इसे ‘एक और आईएएस’ बनाने की भूल नहीं करनी चाहिए। सिर्फ़ एक सामान्य प्रशासनिक परीक्षा के ज़रिए युवाओं की भर्ती करना और उन्हें कुछ महीनों की ट्रेनिंग दे देना एक विशेषज्ञ सेवा नहीं कहला सकता। शिक्षा प्रशासन के लिए एक ऐसी चयन प्रक्रिया होनी चाहिए जो शिक्षा नीति, शिक्षा अर्थशास्त्र, क़ानून, सांख्यिकी (स्टैटिस्टिक्स), लर्निंग साइंसेज, पेडागोजी, मूल्यांकन और तकनीकी प्रशासन की समझ को परखे।
इसके साथ ही, उन लोगों के लिए भी एक रास्ता होना चाहिए जिन्होंने सालों तक क्लासरूम, स्कूलों और शिक्षा प्रशासन में काम किया है, जैसे शिक्षक, प्राचार्य, राज्य शिक्षा सेवा के अफ़सर, प्रशिक्षण संस्थानों के विशेषज्ञ, विश्वविद्यालय के शिक्षक और शिक्षा शोधकर्ता। लेकिन सिर्फ़ अनुभव को ही प्रशासनिक योग्यता का सबूत मान लेना भी ठीक नहीं होगा; चयन प्रक्रिया पारदर्शी और कड़ी होनी चाहिए। इसका मकसद किसी एक समूह को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि एक पेशेवर ढांचे के भीतर विषय के ज्ञान और प्रशासनिक क्षमता का तालमेल बिठाना होना चाहिए।
दरअसल, इस पूरी व्यवस्था में संघवाद (फेडरलिज्म) से जुड़ी चिंताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। शिक्षा में भाषा, संस्कृति, स्थानीय स्थितियों और राज्यों की संस्थागत भूमिका बेहद अहम है। इसलिए, केंद्र की तरफ़ से थोपी गई कोई भी सेवा एक व्यावहारिक हल नहीं हो सकती। संविधान का अनुच्छेद 312 ऑल-इंडिया सर्विसेज बनाने का रास्ता तो देता है, लेकिन असली चुनौती केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक सहमति और एक व्यावहारिक ढांचा तैयार करने की है।
अगर शिक्षा सेवा बनाई जाती है, तो कैडर के गठन, नियुक्तियों, पोस्टिंग और प्रशासन में राज्यों की भूमिका शुरुआत से ही सुनिश्चित की जानी चाहिए। अफ़सरों को ज़िला स्तर से लेकर राज्य निदेशालयों, परीक्षा संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और केंद्रीय संस्थानों तक में काम करने का मौका मिलना चाहिए। एक समान पेशेवर प्रशासन का मतलब एक समान शिक्षा नीति नहीं होना चाहिए; राज्यों के पास अपनी भाषाई, सांस्कृतिक और स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से फैसले लेने की पूरी आजादी होनी चाहिए।
सबसे अहम बात यह है कि भारत में शिक्षा से जुड़ी विशेषज्ञता की कोई कमी नहीं है। हमारे पास अनुभवी शिक्षक, प्राचार्य, शिक्षाविद, शोधकर्ता और ऐसे अफ़सर मौजूद हैं जिन्हें शिक्षा प्रशासन का दशकों का अनुभव है। कमी सिर्फ़ उस संस्थागत व्यवस्था की है जो इस अनुभव को नीति-निर्माण और प्रशासन के केंद्र तक पहुँचा सके। एक पेशेवर शिक्षा सेवा इस दूरी को पाट सकती है। इसके अफ़सर सिर्फ़ योजनाओं को मंज़ूरी देने या बजट जारी करने के लिए ज़िम्मेदार नहीं होंगे, बल्कि शिक्षकों की तैनाती, स्कूल की सुविधाओं, परीक्षा के इंतज़ाम, ट्रेनिंग और शैक्षणिक नतीजों की लगातार निगरानी के लिए भी जवाबदेह होंगे। इससे शिक्षा प्रशासन व्यक्ति-निर्भर होने के बजाय संस्थागत रूप से जवाबदेह बन सकेगा।
भारतीय शिक्षा के लिए कोई जादुई हल नहीं है। परीक्षाओं में धांधली अपने आप नहीं रुकेगी, भ्रष्टाचार रातों-रात ख़त्म नहीं होगा और स्कूलों की समस्याएँ एक दिन में हल नहीं होंगी। लेकिन यह कदम शिक्षा प्रशासन में विशेषज्ञता, निरंतरता और संस्थागत याददाश्त की एक मज़बूत बुनियाद ज़रूर रख सकता है। मंत्री बदलेंगे, सरकारें बदलेंगी, अफ़सर बदलेंगे, लेकिन शिक्षा व्यवस्था को हर बार शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ेगी। इसलिए, अगले शिक्षा सुधार को सिर्फ़ इस बात तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि परीक्षाएं कैसे कराई जाएँ और प्रश्नपत्रों को कैसे सुरक्षित रखा जाए। अब हमें यह भी पूछना होगा कि भारतीय शिक्षा को चलाने के लिए आख़िर किस तरह का पेशेवर प्रशासनिक ढांचा होना चाहिए।
भारतीय शिक्षा सेवा का विचार दशकों से मौजूद है। इसे बड़ी आसानी से फिर किसी समिति, अगली सरकार या अगले संकट तक के लिए टाला जा सकता है। मुश्किल काम तो यह है कि केंद्र और राज्य एक साथ बैठें और इसका एक व्यावहारिक ढांचा तैयार करें। लेकिन अगर भारत एक ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था और एक विकसित राष्ट्र बनना चाहता है, तो हमें शिक्षा प्रशासन को पेशेवर बनाने का साहस जुटाना ही होगा।
एक मंत्री का इस्तीफा देना एक घटना है। एक अफसर का तबादला होना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। एक समिति की रिपोर्ट सिर्फ एक दस्तावेज है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था एक पूरी पीढ़ी का भविष्य है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मंत्री क्यों गए; सवाल यह है कि यह व्यवस्था आखिर कब बदलेगी?

● शशांक राय, आईआईटीयन और अधिवक्ता, दिल्ली उच्च न्यायालय
● अनुसंधान इनपुट: छवि गुप्ता और शाश्वत संजीव, कानून के छात्र

अन्य समाचार