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स्वर्ण मृग की माया से सीता हरण तक…शबरी के प्रेम और हनुमान मिलन ने किया भावविभोर

 -‘कथा सिया राम की’ में बाली वध के मंचन ने जगाया न्याय और धर्म का संदेश

राजेश सरकार / प्रयागराज

स्वर्ण मृग की मायावी चमक, लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन से उपजा अनर्थ, माता सीता के हरण की हृदयविदारक लीला और भक्त शबरी के निश्छल प्रेम से लेकर प्रभु श्रीराम और हनुमान जी के दिव्य मिलन तक, रामकथा के इन मार्मिक एवं रोमांचकारी प्रसंगों ने शुक्रवार को रामभक्तों को भक्ति, करुणा और धर्म के भावों से सराबोर कर दिया। सार्वजनिक रामलीला समिति ट्रस्ट, नैनी की ओर से आयोजित भव्य रामलीला ‘कथा सिया राम की’ के छठे दिन का मंचन आस्था, आदर्श और जीवंत अभिनय का प्रभावशाली संगम बना। मंच पर प्रस्तुत प्रत्येक प्रसंग ने दर्शकों को रामायण की भाव भूमि से जोड़ते हुए सत्य, समर्पण, मित्रता और न्याय की महत्ता का संदेश दिया।
मंचन की शुरुआत मायावी स्वर्ण मृग के प्रसंग से हुई। मारीच स्वर्ण मृग का रूप धारण कर पंचवटी में पहुंचता है। उसकी अद्भुत छवि देखकर माता सीता उसे पाने की इच्छा व्यक्त करती हैं। उनके आग्रह पर प्रभु श्रीराम मृग के पीछे निकल पड़ते हैं। मारीच की मायावी योजना के तहत उत्पन्न परिस्थितियों के बीच लक्ष्मण भी कुटिया छोड़ने को विवश होते हैं। इसी अवसर का लाभ उठाकर साधु का छद्म वेश धारण किए रावण माता सीता के सम्मुख पहुंचता है। छलपूर्वक लक्ष्मण रेखा पार कराने के बाद वह उनका हरण कर लेता है। सीता हरण के दृश्य ने दर्शकों को भावुक कर दिया। प्रभु श्रीराम के वन में लौटने, माता सीता को न पाकर व्याकुल होने और उनके वियोग में खोज आरंभ करने के प्रसंग ने वातावरण को करुणा में डुबो दिया।
इसके बाद कथा शबरी के आश्रम पहुंची, जहां भक्ति की निर्मल धारा प्रवाहित होती दिखाई दी। वर्षों से प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा कर रहीं माता शबरी अपने आराध्य को सामने पाकर भावविभोर हो उठती हैं। उनकी अगाध श्रद्धा और प्रेम से समर्पित बेर अर्पित करने का प्रसंग दर्शकों के हृदय को छू गया। प्रभु श्रीराम ने शबरी की निष्कपट भक्ति को स्वीकार करते हुए उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश दिया। इस दृश्य ने संदेश दिया कि प्रभु के लिए आडंबर नहीं, बल्कि निर्मल मन, अटूट विश्वास और निष्काम प्रेम ही सर्वोपरि है।
रामकथा ने आगे ऋष्यमूक पर्वत, जो वर्तमान में कर्नाटक के हम्पी क्षेत्र में स्थित है,पर प्रभु श्रीराम और हनुमान जी के पावन मिलन का दृश्य प्रस्तुत किया। हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण को पहचानकर श्रद्धापूर्वक उनके समक्ष अपनी भक्ति और सेवा भाव प्रकट किया। भक्त और भगवान के इस दिव्य मिलन ने रामभक्तों को भावविभोर कर दिया। इसके पश्चात श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता का प्रसंग मंचित हुआ, जिसमें परस्पर विश्वास, वचनबद्धता और संकट में साथ निभाने की भावना उभरकर सामने आई। छठवें दिन के अंतिम प्रमुख प्रसंग में बाली वध का प्रभावशाली मंचन हुआ। सुग्रीव को दिए गए वचन के अनुरूप प्रभु श्रीराम ने बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किंधा का राजपद दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रसंग ने धर्म, कर्तव्य, वचनपालन और न्याय की जटिलताओं पर दर्शकों को विचार करने का अवसर दिया। रामकथा के इन विविध रंगों ने एक ओर जहां छल और अहंकार के परिणामों को उजागर किया, वहीं दूसरी ओर भक्ति, मित्रता और धर्म के प्रति समर्पण का आदर्श भी प्रस्तुत किया।
‘कथा सिया राम की’ का छठा दिन केवल रामलीला का मंचन नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का सजीव पाठ बना, जिसमें सीता हरण की पीड़ा, शबरी की भक्ति, हनुमान जी की सेवाभावना और राम की वचनबद्धता ने दर्शकों के मन पर गहरी छाप छोड़ी।

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