-अनल अज्ञात
-भाग-६
२०१४ में भाजपा का एक बड़ा शहरी वादा था, अत्याधुनिक तकनीक और बुनियादी सुविधाओं से युक्त १०० नए शहर बनाने की शुरुआत। अर्थात संपूर्ण स्मार्ट शहरों की परिकल्पना। घोषणापत्र में इसके साथ जुड़वां शहरों, उपनगरों और मौजूदा शहरी केंद्रों के सुधार की बात भी थी।
हुआ क्या? २०१५ में शुरू हुए स्मार्ट सिटीज मिशन ने मुख्यत: १०० चयनित मौजूदा शहरों में सुधार का रास्ता अपनाया। इसमें चुनिंदा क्षेत्रों का विकास और पूरे शहर में लागू की जा सकने वाली तकनीकी सेवाएं शामिल थीं। इस तरह बड़ी चतुराई से १०० नए स्मार्ट शहर बसाने की मूल परिकल्पना से कन्नी काट ली गई। सवाल यहीं पैदा होता है, १०० नए शहर बसाने की कल्पना और मौजूदा शहरों के कुछ हिस्सों को बेहतर बनाने की योजना को एक ही उपलब्धि वैâसे माना जाए?
इसके बाद सरकारी आंकड़ों में दावा किया गया कि ३१ मार्च २०२६ तक कुल ८,०६४ परियोजनाओं में से ७,७९०, यानी लगभग ९७ प्रतिशत पूरी हो चुकी थीं। पूरी हुई परियोजनाओं का मूल्य `१,५६,२५७ करोड़ बताया गया। सभी १०० शहरों में एकीकृत कमान एवं नियंत्रण केंद्र स्थापित हुए; निगरानी, यातायात, जल प्रबंधन और सार्वजनिक स्थलों के विकास में भी काम हुआ। इन कथित उपलब्धियों की जमीनी हकीकत शहरी जनता से छिपी नहीं है। यदि मान भी लिया जाए कि ये परियोजनाएं पूरी हो गर्इं, तो भी उनकी पूर्णता पूरे शहर की समस्याओं के समाधान का प्रमाण नहीं है। साथ ही यह हिसाब भी जरूरी है कि इन्हें तय समयसीमा में पूरा किया गया या वर्षों की देरी के बाद।
‘डाउन टू अर्थ’ की २९ अप्रैल २०२५ की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च २०२५ तक देश में केवल १८ शहरों की सभी परियोजनाएं पूरी हुई थीं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे सभी १८ शहर पूरी तरह स्मार्ट हो गए थे। बाकी ८२ शहरों में तो उस समय परियोजनाएं ही अधूरी थीं। इसलिए बाद में परियोजनाओं की पूर्णता का प्रतिशत बढ़ जाने से समयसीमा और पूरे शहर में बदलाव के सवाल समाप्त नहीं हो जाते।
इससे भी गंभीर सवाल लाभ के वितरण का है। क्या सुधार पूरे शहर तक पहुंचे या कुछ चुने हुए इलाकों तक सीमित रहे? २०२१ के एक शोध में चयनित क्षेत्रों पर केंद्रित विकास मॉडल की समावेशिता पर प्रश्न उठाए गए थे। २०२६ में प्रकाशित ९६ शहरों के एक अन्य अध्ययन में भी शहरों के प्रदर्शन में बड़े अंतर पाए गए; छोटे और संसाधनों की कमी वाले शहर अपेक्षाकृत पिछड़े रहे। यानी एक ही मिशन के भीतर शहरी बदलाव की गति और क्षमता समान नहीं रही।
ऐसे में पूरे शहर के स्मार्ट होने का सवाल तो अपनी जगह है, सरकार से केवल यह पूछना भी पर्याप्त नहीं कि कितनी परियोजनाएं पूरी हुर्इं। पूछना यह होगा कि कितने नागरिकों को नियमित पानी मिला, सफर कितना आसान हुआ, जलभराव कितना घटा और गरीब बस्तियों की सुविधाओं में कितना सुधार आया? क्या वहां रहने वाले नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं भी मिल पाईं? साथ ही यह सवाल भी जरूरी है कि बनाए गए ढांचे को चालू रखने और उसके रखरखाव का खर्च कौन उठाएगा?
बारह साल बाद चुनावी वादे की परीक्षा परियोजनाओं की सूची से आगे जाकर होनी चाहिए। स्मार्ट होने का प्रमाण नियंत्रण कक्ष की स्क्रीन पर दिखता शहर नहीं, नागरिक के रोजमर्रा के जीवन में आया मापने योग्य सुधार है।
