-विमल मिश्र
धरने, प्रदर्शन व रैलियों के लिए मशहूर आजाद मैदान मुंबई का हाइड पार्क है। उसी तरह जिस तरह कांग्रेस, कॉकरोच जनता पार्टी सहित राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों द्वारा आंदोलन के लिए इन दिनों चर्चा का केंद्र बने मशहूर दिल्ली के एतिहासिक जंतर – मंतर और रामलीला मैदान।
दिल्ली पुलिस द्वारा ऐतिहासिक जंतर-मंतर मैदान को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल सूची से हटाने के बाद विगत १२ अक्टूबर से वहां सभी प्रकार के धरने और प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गई है और इसके विकल्प के रूप में दिल्ली में तीन नए स्थान (रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी मैदान) निर्धारित किए गए हैं। इन बंदिशों को लेकर मामला जब सुप्रीम कोर्ट में खिंचा हुआ है, सहसा हमारा आजाद मैदान भी चर्चा में आ गया है, जिसे हम मुंबई का जंतर – मंतर कह सकते हैं। महाराष्ट्र सरकार की घोषणा के अनुसार, आजाद मैदान अब दक्षिण मुंबई में किसी भी प्रकार के धरने व प्रदर्शनों का एकमात्र स्थान है।
आजाद मैदान आम आदमी के लिए यह शॉर्ट कट है सीएसटी से चर्चगेट के बीच और है गरीब-गुरबों का घर। सीएसटीएम स्टेशन के सामने २५ एकड़ में फैला यह विशाल मैदान मुंबई मेट्रो के निर्माण के सिलसिले में करीब १० वर्ष आम नजरों से ओझल रहा। धरने – प्रदर्शन बंद तो नहीं हुए, पर उनका गौरवशाली रुतबा लुप्त हो गया। मेट्रो निर्माण पूर्ण होने से क्रिकेट मैचों का रुका सिलसिला अब शुरू है और साहित्य कला मंच की रामलीलाओं ने भी अपना पुराना स्थान हासिल कर लिया है, पर वह पुरानी बात अभी भी नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने कुछ ही समय पहले यहां कड़े नियम लागू किए हैं। अब आंदोलन का समय सुबह नौ से शाम छह बजे तक और एक समय में एक दिन ही रहेगाा। सरकारी कामकाज वाले दिन ही आंदोलन और एक समय में अधिकतम ५००० आंदोलनकारियों को ही मैदान में रहने की अनुमति होगी। संबंधित पुलिस स्टेशन से आंदोलन की अनुमति भी सात दिन पहले लेनी अनिवार्य बना दी गई है।
तोप के मुंह से उड़ा दिया
कैंप मैदान-जी हां, आजाद मैदान होने से पहले इसका यही नाम था इस जगह का, जहां १८२८ तक फोर्ट क्षेत्र के तमाम मवेशी घास चरने आते थे। अंग्रेजों को जब मनोरंजन की तलब लगी तब वे इंगलैंड से अपना क्रिकेट मुंबई लाए और कैंप मैदान में उसका स्टंप गाड़ दिया। फिर एक लंबे अरसे यह समीप मौजूद एस्प्लेनेड मैदान के नाम पर ‘एस्प्लेनेड क्रास’ कहलाता रहा। ‘आजाद’ यह बना, जब यहां स्वतंत्रता सेनानियों की सभाएं और रैलियां होने लगीं। १८५७ के गदर ने जब मुंबई में भी रंग दिखाना शुरू किया और शहर की २९ हिंदुस्तानी रेजिमेंटों में से तीन में विद्रोह फैल गया तो १५ अक्टूबर, १८५७ को धनतेरस के दिन अंग्रेज सरकार के सिपाही मरीन बटालियन के ड्रिल हवलदार सैयद हुसैन और १०वीं रेजिमेंट के सिपाही मंगल गुदड़िया की मुश्कें कसकर आजाद मैदान में घसीट लाए, उनकी पीठें तोप के मुंह से बांधी और गोलों से उड़ा दिया। देश की बलिवेदी पर उनके बलिदान की याद आज भी इस मैदान की फेंसिंग पर लगा एक मामूली सा प्लिंथ दिलाता है।
आजाद मैदान के इतिहास में कई और महत्वपूर्ण घटनाएं दर्ज हैं। दिसंबर, १९३१ को यहां जो ऐतिहासिक भीड़ जुटी मुंबई के इतिहास में आज भी उसे विशालतम रैली के रूप में याद किया जाता है, जिसे महात्मा गांधी ने संबोधित किया था। इस रैली से ठीक पहले जवाहरलाल नेहरू और खान अब्दुल गफ्फार खान को गिरफ्तार कर लिया गया था। गांधी और नेहरू ही नहीं, मौलाना आजाद और सरदार वल्लभ भाई पटेल की भी कितनी ही सभाएं यहां हुर्इं। २६ अक्टूबर १९६९ आजाद मैदान के लिए एक और यादगार दिन था, जब यहां मौजूद पांच लाख से ज्यादा मुंबईकरों ने विश्व के पहले चंद्रयात्रियों नील आर्मस्ट्रांग, एडविन ‘बज’ एल्ड्रिन और माइकल कॉलिन्स की अगवानी की। दुनिया का यह शायद एकमात्र मैदान है, जहां एक साथ २२ क्रिकेट मैच होते थे और क्रिकेट की इस नर्सरी में खेले बिना किसी मुंबइया क्रिकेटर को पूर्ण नहीं माना जाता था। यहीं एक कोने पर मौजूद बॉम्बे जिमखाना १९३३ में भारत के पहले टेस्ट मैच की भूमि है। इसी मैदान में १९८७ में खेले गए मैच के दौरान सचिन तेंडुलकर और विनोद कांबली की ६६४ रन की विश्व कीर्तिमान साझीदारी आज तक याद की जाती है।
