मुख्यपृष्ठनए समाचारमां तारा नगरी केसपा : आस्था, इतिहास और सामाजिक चेतना का संगम

मां तारा नगरी केसपा : आस्था, इतिहास और सामाजिक चेतना का संगम

अनिल मिश्र / पटना

बिहार के गया जिले के टिकारी प्रखंड अंतर्गत मां तारा नगरी केसपा हिंदू धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को अपने भीतर समेटे यह गांव विशेष पहचान रखता है। यहां स्थित माँ तारा देवी का मंदिर दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का केंद्र है। भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा ने विश्व को वसुधैव कुटुंबकम का संदेश दिया है। इसी परंपरा में महर्षि कश्यप का विशिष्ट स्थान है, जिन्हें सप्तर्षियों में गिना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में केसपा में महर्षि कश्यप का आश्रम था। कहा जाता है कि कश्यपपुरी नाम से प्रसिद्ध यह क्षेत्र कालांतर में अपभ्रंश होकर केसपा कहलाने लगा। मान्यता यह भी है कि महर्षि कश्यप ने यहां माँ तारा देवी के मंदिर की स्थापना कराई थी।
भगवान शिव को माता ने पिलाया था अमृततुल्य दूध
पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई थी। जनकल्याण के लिए भगवान शिव ने विषपान किया, लेकिन विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे अर्धचेतना की अवस्था में चले गए। ऐसी मान्यता है कि उस समय माँ तारा प्रकट हुईं और भगवान शिव को बालक की तरह गोद में लेकर अपना दूध पिलाया। इससे शिवजी को राहत मिली। इसी कारण मां तारा को भगवान शिव की पालनहार माता के रूप में भी पूजा जाता है।
रहस्यमयी हवनकुंड है आकर्षण का केंद्र
माँ तारा देवी मंदिर परिसर में स्थित विशाल त्रिभुजाकार हवनकुंड श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। स्थानीय मान्यता है कि इस कुंड में वर्षभर हवन किया जाता है और यह कभी नहीं भरता। इस हवनकुंड को लेकर अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर परिसर की यह विशेषता केसपा की धार्मिक पहचान को और विशिष्ट बनाती है।
बलि प्रथा के उन्मूलन की प्रेरक कहानी
मां तारा देवी मंदिर में लगभग एक सदी पूर्व बलि प्रथा प्रचलित थी। वर्ष 1924 में प्रसिद्ध साहित्यकार एवं घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने केसपा गांव का भ्रमण किया था। इसी दौर में पश्चिम बंगाल के वीर रामचंद्र भी यहां आए थे। उनकी प्रेरणा से स्थानीय ग्रामीण स्वर्गीय पारस सिंह और स्वर्गीय प्रयाग नारायण सिंह ने ग्रामीणों के सहयोग से बलि प्रथा पर रोक लगाने की पहल की।
वीर रामचंद्र की पुस्तक विकट यात्रा में केसपा भ्रमण का उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि इसमें पारस सिंह और प्रयाग नारायण सिंह के योगदान को भी रेखांकित किया गया है। यह प्रसंग धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सुधार की चेतना को भी उजागर करता है।
नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
आश्विन मास में शारदीय नवरात्र के दौरान मां तारा देवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु मंदिर में घी के दीप प्रज्वलित करते हैं, जो नौ दिनों तक अनवरत जलते रहते हैं। अष्टमी की रात्रि में माता के श्रृंगार दर्शन के लिए दूर-दराज से भक्त पहुंचते हैं। नवरात्र के अवसर पर मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो जाता है।
महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध और समानता का सवाल
मंदिर की धार्मिक परंपराओं के बीच महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा एक सामाजिक प्रश्न भी विचारणीय है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, नवरात्र के दौरान अष्टमी तक मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहता है।
सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु शेखर का कहना है कि किसी भी धार्मिक स्थल पर लिंग के आधार पर भेदभाव दुर्भाग्यपूर्ण है। यह पुरुष प्रधान मानसिकता का परिणाम है। धर्म और आस्था का मूल उद्देश्य मानव कल्याण, समानता और सद्भाव को बढ़ावा देना होना चाहिए। ऐसे में धार्मिक परंपराओं पर संवाद के माध्यम से विचार करना समय की आवश्यकता है।
माँ तारा देवी मंदिर इस सम्पूर्ण क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान, लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। यहां की परंपराओं में जहां प्राचीन धार्मिक आस्था की झलक मिलती है। केसपा गांव को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए, तभी इस क्षेत्र का विकास तेजी से संभव है।

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