‘जंतर-मंतर’ पर आंदोलन करने के लिए कॉकरोच पार्टी के सौरभ दास और आशुतोष रांका को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और सात दिनों की जेल के बाद रिहा किया। गृह मंत्री अमित शाह द्वारा ‘जंतर-मंतर’ पर किसी भी तरह का आंदोलन न होने देने का हुक्म जारी करने के बाद कॉकरोच और दूसरों ने निषेधाज्ञा तोड़कर वहां आंदोलन किया। इस कृत्य को सरकार ने गैरकानूनी करार दिया। (यह कृत्य देशद्रोही है, ऐसा भी कल कहा जाएगा।) प्रधानमंत्री, गृह मंत्री कितने भयभीत हो चुके हैं, यह उसका उदाहरण है। बच्चों का आंदोलन शांतिपूर्ण था और उनके हाथों में तिरंगा था। सरकार को शांतिपूर्ण आंदोलन से डर लगा या वे तिरंगे से घबरा गए? बच्चों का आंदोलन भ्रष्ट चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ है। बच्चे ‘जंतर-मंतर’ पर कोई ‘डांडिया’ खेलने नहीं गए थे, लेकिन डर इतना कि सरकार ने आंदोलन स्थलों की फेहरिस्त से ‘जंतर-मंतर’ का नाम ही हटा दिया। इसे क्या कहा जाए? अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने सात दिनों के बाद बच्चों को जमानत दी और उससे पहले इन होशियार बच्चों को नसीहत दी। हाई कोर्ट कह रहा है कि आंदोलन के लिए सरकार की अनुमति लेनी चाहिए। वह आपने क्यों नहीं ली? हम अदालत से विनम्रतापूर्वक पूछना चाहते हैं कि, ‘मायलॉर्ड, अन्याय के खिलाफ, राष्ट्रीय घोटालों के खिलाफ
उत्स्फूर्त आंदोलन
हर तरफ हो रहे हैं। सरकार से यदि ऐसे आंदोलन के लिए अनुमति मांगी जाए तो क्या वह सचमुच देगी? सरकार इतनी उदार और लोकतांत्रिक होती तो ‘जंतर-मंतर’ पर ताला नहीं लगाया गया जाता। इसलिए हाई कोर्ट को इस मुद्दे पर सरकार की क्लास लेनी चाहिए। हाई कोर्ट कह रहा है, ‘बच्चों, भले ही आप शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे हों, लेकिन उसमें गलत लोग घुसकर गड़बड़ कर सकते हैं। इसलिए पुलिस की अनुमति आवश्यक है। प्रâांस, अल्बानिया में भी छात्र आंदोलन से ही शुरुआत हुई थी और अब वहां हिंसा, आगजनी चल रही है, यह देख रहे हैं न?’ माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया मार्गदर्शन गलत नहीं है, लेकिन सत्ताधारियों के खिलाफ आंदोलन करने की नौबत क्यों आई है? बच्चे जब बैरिकेड्स तोड़कर घुसते हैं तो निषेधाज्ञा का उल्लंघन होने की आशंका होती है और आंदोलन से संबंध न रखने वाले लोग उसमें घुस सकते हैं, यह चिंता अदालत ने व्यक्त की, लेकिन हकीकत में यह दिल्ली पुलिस को छूटा हुआ पसीना है। मूल रूप से यह आंदोलन ‘जंतर-मंतर’ को मुक्त कराने के लिए है। मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, पटना, कोलकाता जैसी जगहों पर आंदोलन करने की जगहों को ही पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया। यह लोकतंत्र का गला घोंटना है। एक समय था जब संसद के दरवाजे तक और मुंबई में मंत्रालय के दरवाजे तक भी मोर्चे जाते थे और वहीं उन्हें रोका जाता था। मुख्यमंत्री, मंत्री, केंद्रीय मंत्री मोर्चों का सामना करके बात सुनते थे। अब
वह दौर खत्म हो गया
है और मोदी और शाह ने यह नीति तय की है कि ना तो लोगों को सवाल पूछना चाहिए और न ही सवाल पेश किया जाए। एक तरह से राज्य में और देश में ‘पुलिस राज’ शुरू हो गया है। आंदोलन में गलत लोग घुसते हैं, यह अदालत किस आधार पर कहती है? सोनम वांगचुक, राहुल गांधी और कई सांसद आंदोलन करते हैं। क्या वे गलत लोग हैं? दिल्ली के आंदोलन में लाखों लोग इकट्ठा हुए और उनकी तरफ से कुछ भी गलत नहीं हुआ। इसके विपरीत पुलिस ने बर्बरतापूर्वक व्यवहार किया। सत्ता पक्ष ने गुंडों को खाकी वर्दी पहनाकर उनसे आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं पर हमले करवाए। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति परकला प्रभाकर अब ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन करने वाले हैं। तो क्या परकला प्रभाकर गलत व्यक्ति हैं? जाहिर है, केंद्र सरकार के कर्णधार अपने ही लोगों से डर गए हैं। जिस अदालत के सामने रांका और दास की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई, उसके एक न्यायाधीश ने दुष्कर्म के आरोपी कुलदीप सेंगर की सजा रद्द करने का पैâसला दिया था, लेकिन तिरंगा फहराने के लिए आंदोलन करनेवाले बच्चों को अदालत की तरफ से सीख दी जा रही है। कमाल है! ऐसा कमाल सिर्फ मोदी-शाह के राज में ही हो सकता है।
