-उमन गुप्ता
लोकतंत्र में वोट सिर्फ एक बटन दबाने का अधिकार नहीं, बल्कि सरकार चुनने की नागरिक की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन जब मतदाता सूची में करोड़ों प्रविष्टियां अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी होने जैसी श्रेणियों में दर्ज हों, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम छूट गया तो उसकी जवाबदेही कौन लेगा? चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में करीब १३.३९ करोड़ प्रविष्टियां ऐसी श्रेणियों में रखे जाने का आंकड़ा सामने आया है। आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है, लेकिन इतनी बड़ी प्रक्रिया में पारदर्शिता और गलतियों को सुधारने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लगभग ९५.४० करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड की समीक्षा के दौरान करीब १३.३९ करोड़ प्रविष्टियां अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टियों जैसी श्रेणियों में रखी गर्इं। इनमें लगभग ६.३० करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित, ३.०१ करोड़ अनुपस्थित या जिनका पता नहीं चल पाया, २.८० करोड़ मृत और १.०२ करोड़ दोहरी प्रविष्टियों की श्रेणी में थीं। हालांकि, इन सभी प्रविष्टियों को पात्र मतदाताओं के गलत तरीके से काटे गए नाम बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम छूटे और ऐसी शिकायतों का निपटारा कितनी तेजी से हुआ।
गलती का बोझ मतदाता क्यों उठाए?
२० अक्टूबर को प्रकाशित रॉयटर्स की रिपोर्ट में दिल्ली के एक मतदाता का मामला सामने आया, जिसे मतदाता सूची में मृत घोषित कर दिया गया था। नाम दोबारा जुड़वाने के लिए उसे सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े। यह एक मामला देशव्यापी गलती की दर साबित नहीं करता, लेकिन प्रशासनिक चूक होने पर नागरिक को होने वाली परेशानी जरूर दिखाता है। प्रवासी मजदूरों, किराये के मकानों में रहने वाले लोगों और बार-बार पता बदलने वाले परिवारों के सामने भी दस्तावेजों और सत्यापन की चुनौती हो सकती है। ऐसे में सवाल है कि क्या मतदाता को समय पर सूचना दी गई, क्या उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिला और क्या नाम छूटने पर सुधार की प्रक्रिया आसान है?
