-शीतल अवस्थी
दुर्गा सप्तशती का विपत्ति नाश मंत्र जगज्जननी से पीड़ितों के दुःख दूर करने और संपूर्ण चराचर जगत की रक्षा करने की प्रार्थना है। संकट के समय इसका श्रद्धापूर्वक जप मन को धैर्य, आशा और कठिन परिस्थितियों का सामना करने का आत्मबल प्रदान करता है।
मां दुर्गा को संकटों से तारने वाली देवी माना गया है। ‘दुर्गा’ नाम का एक भावार्थ ऐसी शक्ति है, जो भक्त को दुर्गम परिस्थितियों से सुरक्षित बाहर निकालती है। जीवन में बीमारी, आर्थिक परेशानी, पारिवारिक अशांति, भय अथवा कोई आकस्मिक संकट आने पर भक्त माता का स्मरण करते हैं।
दुर्गा सप्तशती में वर्णित विपत्ति नाश का मंत्र है-
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥ङङ
मंत्र का सरल अर्थ
हे देवी! अपनी शरण में आए हुए पीड़ितों का दुःख दूर करने वाली माता, हम पर प्रसन्न हों। हे संपूर्ण जगत की जननी! प्रसन्न हों। हे विश्व की अधीश्वरी! संसार की रक्षा करें, क्योंकि आप ही समस्त चर और अचर जगत की स्वामिनी हैं।
इस मंत्र की विशेषता यह है कि इसमें केवल अपने संकट के निवारण की प्रार्थना नहीं की गई है। देवी से पूरे विश्व और सभी प्राणियों की रक्षा की कामना की गई है। इस कारण इसका पाठ व्यक्तिगत विपत्ति के साथ महामारी, प्राकृतिक आपदा, युद्ध अथवा सामूहिक संकट के समय भी कल्याण की भावना से किया जा सकता है।
‘प्रपन्नार्तिहरे’ का गहरा भाव
मंत्र में देवी को ‘प्रपन्नार्तिहरे’ कहा गया है। ‘प्रपन्न’ का अर्थ शरण में आया हुआ, ‘आर्ति’ का अर्थ दुःख अथवा पीड़ा और ‘हरे’ का अर्थ उसे दूर करने वाली शक्ति है। अर्थात मां दुर्गा उस भक्त के दुःख हरती हैं, जो अहंकार छोड़कर श्रद्धापूर्वक उनकी शरण ग्रहण करता है।
शरणागति का अर्थ कर्म और प्रयास छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है—अपनी पूरी क्षमता से उचित प्रयत्न करना और परिणाम देवी पर छोड़ देना। संकट के समय विवेकपूर्ण कदम उठाते हुए ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना ही सच्ची शरणागति है।
चर और अचर की रक्षा की प्रार्थना
‘चराचरस्य’ शब्द में संपूर्ण सृष्टि समाहित है। ‘चर’ से आशय चलने-फिरने वाले जीवों से है और ‘अचर’ में पर्वत, वनस्पति, नदियां तथा प्रकृति के स्थिर स्वरूप सम्मिलित हैं। इसलिए यह मंत्र मानव मात्र के कल्याण तक सीमित नहीं है।
इसके पाठ के साथ प्रकृति, पशु-पक्षियों, जलस्रोतों और पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेना भी आवश्यक है। संपूर्ण सृष्टि को देवी का स्वरूप मानने वाला व्यक्ति किसी जीव या प्राकृतिक संपदा को अनावश्यक हानि नहीं पहुंचाता।
मंत्र-जप की सरल विधि
प्रातःकाल अथवा संध्याकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा-स्थान को साफ करके मां दुर्गा का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। घी का दीपक और धूप जलाएं तथा माता को लाल पुष्प अर्पित करें।
पहले देवी का ध्यान करते हुए सामान्य मंत्र—
ॐ दुं दुर्गायै नमः
का ११ बार जप करें। इसके बाद विपत्ति नाश मंत्र का ११, २१ अथवा १०८ बार पाठ करें। जप के लिए रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला का उपयोग किया जा सकता है। अंत में अपने साथ परिवार, समाज और संसार के सभी पीड़ित प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।
संकट अत्यंत गंभीर हो और विधिवत पूजा संभव न हो, तो शांत मन से देवी का ध्यान करके इस मंत्र का तीन बार पाठ भी किया जा सकता है।
नवरात्रि में विशेष साधना
वैसे तो इस मंत्र का जप कभी भी किया जा सकता है, लेकिन नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार, अष्टमी और नवमी को इसका पाठ विशेष फलदायी माना गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के चौथे, पांचवें और ग्यारहवें अध्याय का श्रद्धापूर्वक पाठ भी संकट-शांति की कामना से किया जाता है।
किसी विशेष संकल्प, अनुष्ठान, हवन अथवा बड़ी जप-संख्या के लिए योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लेना उचित है। सामान्य भक्त इस मंत्र का दैनिक पाठ बिना किसी जटिल अनुष्ठान के कर सकते हैं।
आध्यात्मिक साधना के साथ व्यावहारिक प्रयास
मंत्र-जप मन को स्थिर और आशावान बनाता है, लेकिन इसे व्यावहारिक प्रयासों का विकल्प नहीं समझना चाहिए। बीमारी में चिकित्सक, अपराध अथवा हिंसा में पुलिस, कानूनी विवाद में विधिक विशेषज्ञ और मानसिक संकट में योग्य परामर्शदाता की सहायता लेना आवश्यक है।
मां दुर्गा की शक्ति संकट से भागने की नहीं, बल्कि उसका साहस और विवेक से सामना करने की प्रेरणा देती है। विपत्ति नाश मंत्र का वास्तविक फल तब मिलता है, जब साधक प्रार्थना के साथ धैर्य, परिश्रम, सत्कर्म और दूसरों की सहायता का मार्ग भी अपनाता है।
