-एआई के इस्तेमाल और गलत पहचान रोकने के सुरक्षा उपायों पर भी स्पष्ट जवाब नहीं
विपक्ष ने पारदर्शिता पर उठाए सवाल
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव प्रक्रिया की बुनियाद है, लेकिन इसी सूची में गड़बड़ियां तलाशने वाले सॉफ्टवेयर की पहचान और कार्यप्रणाली को लेकर चुनाव आयोग के रुख ने पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची में विसंगतियां पहचानने के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर का नाम और संस्करण बताने से आयोग ने इनकार कर दिया।
इसके लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत ‘व्यावसायिक गोपनीयता’, ‘ट्रेड सीक्रेट’ और बौद्धिक संपदा के संरक्षण का हवाला दिया गया है। सवाल यह है कि जब मामला नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा हो, तो तकनीकी गोपनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनेगा?
तेलंगाना के करीमनगर के सामाजिक कार्यकर्ता एम.ए. मुजीब अय्यूब ने आयोग से पूछा था कि मतदाता डेटा में विसंगतियां तलाशने के लिए कौन-सा सॉफ्टवेयर, एल्गोरिदम या एआई प्लेटफॉर्म इस्तेमाल किया जा रहा है। क्या सिस्टम अपने आप संदिग्ध रिकॉर्ड चिह्नित करता है? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), मशीन लर्निंग या प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स का इस्तेमाल होता है? किसी वास्तविक मतदाता की गलत पहचान होने से बचाने के लिए क्या सुरक्षा उपाय हैं? आयोग ने १६ अक्टूबर के जवाब में सॉफ्टवेयर का नाम और संस्करण बताने से इनकार किया। एआई के इस्तेमाल और सुरक्षा उपायों से जुड़े सवालों पर उसने कहा कि मांगी गई जानकारी स्पष्टीकरण के दायरे में आती है।
विपक्ष का सवाल-आयोग क्या छिपा रहा है?
तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने भी सॉफ्टवेयर का विवरण सार्वजनिक न करने पर सवाल उ’ाए। वहीं, तृणमूल कांग्रेस नेता साकेत गोखले ने पहले दाखिल आरटीआई के जवाब पर आपत्ति जताते हुए पूछा था कि सार्वजनिक प्राधिकरण के सॉफ्टवेयर की जानकारी को व्यावसायिक हितों के आधार पर गोपनीय क्यों रखा जा रहा है और आखिर किस कंपनी के व्यावसायिक हितों की रक्षा की जा रही है?
