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पॉलिटिका : ट्रंप की फ्री ‘रेवड़ी’ यानी नीतियों की नाकामी पर नकदी का मरहम!

-के.पी. मलिक

लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए जनता से वादे करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठने लगें, महंगाई आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगे और मतदाताओं का भरोसा डगमगाने लगे, तब अचानक नकद सहायता और आर्थिक राहत के बड़े-बड़े वादे राजनीतिक हथियार बन जाएं, तो उनकी मंशा की पड़ताल जरूरी हो जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चुनावी रणनीति को लेकर उठ रहा सवाल भी यही है कि क्या अमेरिका में अब ‘रेवड़ी राजनीति’ का नया अध्याय लिखा जा रहा है?
दरअसल, अमेरिका में ३ नवंबर २०२६ को होनेवाले मध्यावधि चुनाव रिपब्लिकन पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी सीटों और सीनेट की लगभग एक-तिहाई सीटों पर मतदान होना है। इनका नतीजा तय करेगा कि ट्रंप को अपने शेष कार्यकाल में कांग्रेस का कितना राजनीतिक समर्थन मिल पाएगा। ऐसे में आम परिवारों, किसानों और मध्यम वर्ग को आर्थिक राहत देने वाले प्रस्तावों का चुनावी महत्व बढ़ जाता है। लेकिन यहां एक बुनियादी फर्क समझना जरूरी है। चुनाव से पहले घोषित हर राहत योजना को मुफ्त की रेवड़ी कहना उचित नहीं होगा। सवाल यह है कि सहायता का आधार क्या है, उसका खर्च कौन उठाएगा, लाभार्थियों का चयन वैâसे होगा और क्या इससे लोगों की आर्थिक मुश्किलों का स्थायी समाधान निकलेगा या केवल चुनाव तक राहत का एहसास पैदा होगा?
ट्रंप का ५ हजार डॉलर प्रति वयस्क नागरिक देने का प्रस्ताव इसी राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने सितंबर में घोषणा की कि यदि रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखती है, तो हर वयस्क अमेरिकी नागरिक को यह रकम दी जाएगी। अमेरिकी आबादी के अनुमान के आधार पर इस योजना पर लगभग १.२ से १.३५ लाख करोड़ डॉलर नहीं, बल्कि १.२ से १.३५ ट्रिलियन डॉलर तक खर्च होने का अनुमान है। यानी भारतीय संख्या पद्धति में करीब १.२ से १.३५ लाख करोड़ डॉलर, जो भारतीय रुपये में सैकड़ों लाख करोड़ रुपये के बराबर बैठता है। इस प्रस्ताव के लिए धन कहां से आएगा, इसकी स्पष्ट और विस्तृत वित्तीय योजना सामने नहीं आई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के स्पीकर माइक जॉनसन भी कह चुके हैं कि भुगतान के लिए कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक होगी।
दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन ने किसानों के लिए आठ अरब डॉलर की एकमुश्त सहायता योजना घोषित की है। इसका उद्देश्य बढ़ती डीजल कीमतों और खेती की लागत से प्रभावित किसानों को राहत देना है। लेकिन यहां भी सवाल है कि जब किसानों को फसल उगाने और खेतों तक पहुंचने के लिए र्इंधन पर असाधारण खर्च करना पड़ रहा है, तो क्या केवल सरकारी सहायता बांटना पर्याप्त है? रॉयटर्स की २३ अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस राशि का वितरण चुनाव के बाद, संभवत: साल के अंत के आसपास होगा। यानी घोषणा और वास्तविक राहत के बीच समय का अंतर भी राजनीतिक बहस का विषय है।
दरअसल, ट्रंप की मुश्किल यह है कि अमेरिकी मतदाता केवल राष्ट्रवादी नारों या विदेश नीति की आक्रामकता से संतुष्ट नहीं हैं।
उन्हें पेट्रोल, किराने के सामान, मकान और स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों से राहत चाहिए। अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो के १४ अक्टूबर को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर २०२६ में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सालाना आधार पर ३.७ प्रतिशत बढ़ा, जबकि अकेले उस महीने पेट्रोल की कीमतों में ९.१ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। ये आंकड़े बताते हैं कि महंगाई का दबाव अभी समाप्त नहीं हुआ है।
यहीं से ट्रंप की राजनीति की असली परीक्षा शुरू होती है। जो राष्ट्रपति अपनी व्यापार नीतियों, आयात शुल्क और आर्थिक ताकत का बखान करते रहे हैं, उन्हें अब जनता को यह समझाना पड़ रहा है कि उनके आर्थिक पैâसलों से आम परिवारों को वास्तविक राहत कब और वैâसे मिलेगी। ईरान के साथ युद्ध से जुड़ी ऊर्जा कीमतों की उथल-पुथल ने भी हालात को जटिल बनाया है। हालांकि, यह कहना कि अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई है, उपलब्ध आंकड़ों से साबित नहीं होता। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि महंगाई, र्इंधन की कीमतों और कमजोर उपभोक्ता विश्वास ने ट्रंप प्रशासन के आर्थिक प्रदर्शन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
भारत के राजनीतिक परिदृश्य में इस घटनाक्रम का खास महत्व है। यहां चुनावों के दौरान मुफ्त बिजली, नकद सहायता, महिलाओं के लिए आर्थिक योजनाओं और किसानों को राहत देनेवाली घोषणाओं पर अक्सर तीखी बहस होती है। एक पक्ष इन्हें जनकल्याण बताता है, दूसरा सरकारी खजाने पर बोझ। लेकिन यही कसौटी अमेरिका पर भी लागू होनी चाहिए। यदि नकद सहायता गरीबों और संकटग्रस्त किसानों को सुरक्षा देती है तो उसे केवल चुनावी रेवड़ी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। मगर यदि अरबों-खरबों डॉलर बांटने का वादा सीधे इस शर्त से जुड़ जाए कि मतदाता पहले सत्तारूढ़ दल को जिताएं, तो कल्याण और चुनावी प्रलोभन के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
दरअसल, लोकतंत्र में जनता को आर्थिक राहत देना सरकार का दायित्व है, लेकिन राहत की घोषणा किसी नेता की निजी उदारता नहीं होती। उसका पैसा अंतत: सरकारी संसाधनों, करदाताओं या उधार से आता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि ट्रंप पांच हजार डॉलर देंगे या नहीं; सवाल यह है कि इस खर्च की कीमत कौन चुकाएगा और क्या यह महंगाई की समस्या को और बढ़ा सकता है?
बहरहाल, ट्रंप के सामने असली चुनौती डॉलर बांटने की नहीं, अपनी आर्थिक नीतियों पर जनता का भरोसा बहाल करने की है। यदि नीतियां सफल हैं, तो चुनाव से ठीक पहले इतने बड़े नकद वादे की जरूरत क्यों पड़ रही है? और यदि जनता की जेब पर बढ़ते खर्च का दबाव वास्तविक है, तो क्या एकमुश्त रकम उस संकट का स्थायी समाधान बन सकती है? अमेरिका हो या भारत, चुनावी राजनीति का एक ही सबक है कि जनता को राहत चाहिए, लेकिन राहत के नाम पर केवल वादों की बारिश नहीं। मतदाता को यह भी जानने का अधिकार है कि पैसा आएगा कहां से, खर्च होगा वैâसे और चुनाव के बाद इन वादों का क्या होगा। वरना ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा हो या जनकल्याण का दावा, नकदी बांटने की राजनीति अंतत: उसी सवाल के कटघरे में खड़ी होगी कि क्या सरकार जनता की जिंदगी बेहतर बना रही है या केवल अगला चुनाव जीतने की कीमत तय कर रही है?
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)

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