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संपादकीय : ‘पीस बॉण्ड’, का क्या मतलब है भाई?

भारत में नागरिकों की स्वतंत्रता दिन-प्रतिदिन संकट में दिखाई दे रही है और यह स्वतंत्रता बनी रहे इसके लिए न्याय व्यवस्था को भारत में पहल करनी होगी। सभी संवैधानिक संस्थाओं पर मोदी-शाह जैसे लोग कब्जा करके विजयी पताका फहरा रहे हैं, ऐसे में यदि न्याय व्यवस्था ने अपनी रीढ़ सीधी रखी तो आज के सुप्रीम कोर्ट का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। भारत में लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करना एक गंभीर अपराध माना जाने लगा है। दिल्ली जैसी जगहों पर आंदोलन करने के कई स्थानों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिसमें ‘जंतर-मंतर’ भी शामिल है। कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे ने ‘जंतर-मंतर’ पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ ‘तिरंगा’ आंदोलन किया। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उनकी रिहाई के बदले उनसे ‘पीस बॉण्ड’, यानी आगे से शांति बनाए रखने का मुचलका लिखवा लिया। नेहा बोरा नाम की एक अन्य तेज-तर्रार लड़की ने भी आंदोलन किया, लेकिन उसने इस प्रकार के ‘पीस बॉण्ड’ (शांति के मुचलके) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इसलिए मार्वंâडेय काटजू जैसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों ने नेहा बोरा की प्रशंसा की और कॉकरोच पार्टी के उन चारों नेताओं पर तीखी आलोचनाओं की बौछार कर दी। काटजू का कहना है कि ‘पीस बॉण्ड’ पर हस्ताक्षर करके कॉकरोच जनता पार्टी के युवा नेताओं ने बहुत बड़ी गलती की है। दरअसल, ये तमाम युवा नागरिक स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं। उन्हें बार-बार पुलिस हिरासत और तिहाड़ जैसे जेलों में ठूंसा जा रहा है। काटजू जैसे लोग खुद कोई भी भूमिका निभाने को तैयार नहीं हैं और दूसरों को मुफ्त की सलाह दे रहे हैं। नेहा बोरा और उसका संगठन अधिक तीव्रता से आंदोलन कर रहा है। उसके पीछे
‘वामपंथी’ दल खड़े
हैं और वामपंथी दलों को सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने का सबसे अधिक अनुभव है। दीपके आदि लोग अभी नए हैं और वे अब तैयार हो रहे हैं। न्यायमूर्ति काटजू को इन संघर्षरत युवाओं का मार्गदर्शन करना चाहिए। यदि ‘पीस बॉण्ड’ से जुड़ा कानून नागरिक स्वतंत्रता का गला घोंटने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, तो न्यायमूर्ति काटजू को अपना वकीलों वाला कोट दोबारा पहनकर अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। ‘पीस बॉण्ड’ के नाम पर सरकार बहुत सख्ती से पेश आ रही है। सरकार को आंदोलनों का शोर-शराबा नहीं चाहिए। देश में श्मशान जैसी शांति और अंधभक्तों की तालियों तथा जय-जयकार के नारे चाहिए। अब हम कुछ जानकारी देना चाहते हैं। भारतीय न्याय संहिता की धारा १२६ (पुरानी धारा १०७ आईपीसी) के अंतर्गत यह बॉण्ड शांति बनाए रखने का एक वचन है। इसका मतलब मौन रहने की गारंटी नहीं है। यह धारा किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक प्रदर्शन में हिस्सा लेने से नहीं रोकती है। अनुच्छेद १९ नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का संरक्षण देता है। शांति भंग होना एक पूरी तरह से अलग बात है। इसलिए यह दावा करना गलत है कि किसी को ‘पीस बॉण्ड’ दे दिए जाने के बाद वह दोबारा आंदोलन में शामिल नहीं हो सकता। और फिर ‘पीस बॉण्ड’ का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह पुलिस अधिकारी तय नहीं करते हैं। भारतीय न्याय संहिता की धारा १४१ (पुरानी धारा १२२) के अनुसार यह ‘उल्लंघन’ दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) के सामने साबित करना पड़ता है। यदि पुलिस यह साबित कर देती है कि ‘बॉण्ड का उल्लंघन’ हुआ है तो इसका परिणाम क्या होगा? बॉण्ड की शेष अवधि के लिए अधिकतम एक वर्ष का साधारण कारावास और राशि की जब्ती, इसे लंबी सजा नहीं कहा जा सकता। अब
लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की लड़ाई में
उतरे युवाओं के आदर्श यदि भगत सिंह, अशफाकउल्ला खान आदि रहे हैं, तो उन्हें इस कारावास की ना तो फिक्र करनी चाहिए और ना ही इसका डर होना चाहिए। अब हम सभी युवाओं और देशप्रेमियों से कहना चाहते हैं कि ‘पीस बॉण्ड’ पर हस्ताक्षर करने का मतलब सरकार से माफी मांगना या घुटने टेकना नहीं है। इसमें किसी भी अपराध का कोई कबूलनामा नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट ने मधु लिमये मामले में स्पष्ट किया था कि यह ‘अधिकार’ या ‘बॉण्ड’ निवारक, प्रतिबंधात्मक (प्रिवेंटिव) है, दंडात्मक नहीं। ‘पीस बॉण्ड’ पर हस्ताक्षर करने के कारण होनेवाली आलोचनाओं से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। भाजपा के लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया था और उनमें से कई लोगों ने अंग्रेजों के ‘मुखबिर’ यानी जासूस के तौर पर काम किया था। इसलिए अंग्रेजी हुकूमत के समय के कई माफी नामों से आज के ‘पीस बॉण्ड’ की तुलना करना इतिहास और कानून दोनों के साथ अन्याय है। हमारी जानकारी के अनुसार नेहा बोरा से किसी ने ‘पीस बॉण्ड’ नहीं मांगा। नेहा बोरा बार-बार आंदोलन कर रही है और पुलिस उसे रोक रही है। बोरा का कहना है कि आंदोलन करना उसका अधिकार है। यह उसकी स्वतंत्रता है। उसके मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि जब तक जांच चल रही है और पुलिस की पूरी रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक कोई भी बॉण्ड नहीं मांग सकता। कॉकरोच जनता पार्टी के लड़कों और नेहा बोरा के संघर्ष में यही अंतर है। न्यायमूर्ति काटजू को युवाओं के लिए कम से कम ‘पीस बॉण्ड’ पर एक अभ्यास वर्ग (क्लास) चलाना चाहिए। सरकार की मन:शांति जब विभिन्न कारणों से विचलित हो रही है, तो इस बात का कोई ठिकाना नहीं है कि वह कब किस पर ‘पीस बॉण्ड’ का हथियार उठा ले। प्रधानमंत्री मोदी और गौतम अडानी के बीच ‘प्रâेंडशिप बॉण्ड’ पर एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। इसकी वजह से यह शांति भंग हो गई और उस वीडियो को ही हटा दिया गया। इसे क्या कहा जाए? जिसके चलते भी शांति भंग हुई और पुलिस ने उस वीडियो को ही डिलीट करवा दिया। इसे क्या कहा जाए?

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