मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : सत्ता परिवर्तन का असली डर कुर्सी नहीं, हिसाब-किताब है!

तीर-ए-तौसीफ : सत्ता परिवर्तन का असली डर कुर्सी नहीं, हिसाब-किताब है!

-तौसीफ कुरैशी
सत्ता परिवर्तन का डर सिर्फ इस बात का नहीं होता कि कुर्सी हाथ से निकल जाएगी। असली डर तो उसके बाद शुरू होता है, जब सत्ता के गलियारों में वर्षों से बंद पड़ी फाइलों पर जमी धूल हटने लगती है, पुराने फैसलों की नीयत पर सवाल उठने लगते हैं और जनता के पैसे का हिसाब मांगा जाता है। कुर्सी पर बैठे हुए आदमी को अक्सर लगता है कि सत्ता ही सुरक्षा कवच है, लेकिन लोकतंत्र का असली इम्तिहान तभी होता है, जब सत्ता बदलती है और कानून की नजर में सबको बराबर माना जाता है। सवाल यह नहीं कि कौन सत्ता में रहेगा और कौन विपक्ष में बैठेगा। सवाल यह है कि क्या देश की संस्थाएं इतनी स्वतंत्र हैं कि सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति से जवाब मांग सकें? क्या सरकारी पैâसलों की जांच राजनीतिक निष्ठा देखकर होगी या सबूतों और कानून के आधार पर? अगर सत्ता परिवर्तन के बाद इन सवालों पर गंभीरता से काम होता है तो इसे बदले की राजनीति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जवाबदेही कहा जाना चाहिए।
पहला सवाल हिरेन पांड्या से जज लोया तक के मामलों का सच
हिरेन पांड्या की हत्या से लेकर जज बी.एच. लोया की मृत्यु तक कई संवेदनशील मामले वर्षों से सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा रहे हैं। इन मामलों में न्यायिक प्रक्रियाओं और जांच से संबंधित जो तथ्य सामने आए हैं, उनका सम्मान जरूरी है। लेकिन यदि भविष्य में किसी मामले में नए, विश्वसनीय साक्ष्य सामने आते हैं तो कानून के अनुसार निष्पक्ष समीक्षा और जांच की संभावना से इनकार क्यों किया जाए? न्याय का तकाजा है कि न किसी को राजनीतिक संरक्षण मिले और न ही किसी को बिना प्रमाण दोषी ठहराया जाए। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है, लेकिन सवालों के जवाब सबूतों और कानून के आधार पर ही मिलने चाहिए।
दूसरा सवाल कॉरपोरेट कर्ज और जनता की गाढ़ी कमाई
देश के बड़े उद्योगपतियों को दिए गए कर्ज, बैंकों के बट्टे खाते में डाली गई रकम और कर्ज वसूली की प्रक्रिया को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। यहां यह अंतर समझना भी जरूरी है कि बट्टे खाते में डालना हमेशा कर्ज माफ करना नहीं होता। फिर भी सवाल बना रहता है कि क्या बड़े कर्जदारों के मामले में नियमों का समान रूप से पालन हुआ? क्या किसी प्रभावशाली कारोबारी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया? क्या कहीं भ्रष्टाचार, मिलीभगत या कमीशनखोरी के प्रमाण हैं? यदि ऐसे प्रमाण मिलते हैं तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और कानून के तहत वसूली की जानी चाहिए। जनता के पैसे की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी है, किसी उद्योगपति की सुविधा नहीं।
तीसरा सवाल देश की संपत्तियों की बिक्री और मूल्यांकन
सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी परिसंपत्तियों का निजीकरण या विनिवेश अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन जब देश की संपत्ति बेची जाती है, तब उसकी कीमत, बोली की प्रक्रिया और खरीदारों को मिलने वाले लाभ पर सवाल पूछना जनता का अधिकार है। क्या परिसंपत्तियों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया गया? क्या सभी संभावित खरीदारों को समान अवसर मिला? क्या सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा? यदि किसी सौदे में अनियमितता या भ्रष्टाचार के प्रमाण मिलते हैं तो उसकी जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। सरकारी संपत्ति किसी सरकार की निजी जागीर नहीं, जनता की अमानत है।
चौथा सवाल-भाजपा के कार्यालयों और बड़े निर्माणों का पैसा कहां से आया?
देश के विभिन्न जिलों में भाजपा के कार्यालयों और दिल्ली में आरएसएस के विशाल परिसर की चर्चा के साथ उनके निर्माण पर हुए खर्च और वित्तीय स्रोतों को लेकर पारदर्शिता की मांग भी उठती है। किसी राजनीतिक दल का कार्यालय बनाना या किसी संगठन का भवन होना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि धन कहां से आया, किसने दिया, किन नियमों के तहत दिया गया और उसका लेखा-जोखा कितना पारदर्शी है? यदि चंदे, संपत्ति या निर्माण लागत को लेकर कोई संदेह है तो संबंधित दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में राजनीतिक ताकत के साथ वित्तीय पारदर्शिता भी जरूरी है।
पांचवां सवाल आरएसएस की वित्तीय और कानूनी जवाबदेही
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित सभी संगठनों की कानूनी स्थिति, पंजीकरण से जुड़े नियमों, आय-व्यय, चंदे और कर संबंधी अनुपालन की जांच मौजूदा कानूनों के अनुसार होनी चाहिए। किसी संगठन के विचारों से सहमति या असहमति अलग विषय है, लेकिन कानून के पालन का सवाल अलग है। यदि किसी संगठन पर लागू कानूनी दायित्व हैं, तो उनका पालन सुनिश्चित होना चाहिए। न किसी संगठन को राजनीतिक प्रभाव के कारण विशेष छूट मिले। कानून का समान इस्तेमाल ही लोकतंत्र की विश्वसनीयता की बुनियाद है। आखिर सत्ता परिवर्तन से डर किस बात का?
लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती। सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन संस्थाएं, संविधान और जनता का अधिकार स्थायी महत्व रखते हैं। यदि किसी सरकार ने ईमानदारी से काम किया है, तो निष्पक्ष जांच से उसे डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए और यदि कहीं अनियमितता हुई है, तो सत्ता में बने रहने भर से कोई व्यक्ति या संगठन जवाबदेही से बच नहीं सकता। जांच निष्पक्ष हो, प्रक्रिया पारदर्शी हो, सबूत सार्वजनिक कानूनों के अनुरूप परखे जाएं और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई हो। असली बदलाव तब होगा, जब व्यवस्था व्यक्ति और पार्टी से ऊपर उठकर संविधान के प्रति जवाबदेह बनेगी। आखिरकार, सवाल कुर्सी का नहीं, उस कुर्सी पर बैठकर किए गए पैâसलों का है। जनता का पैसा, देश की संपत्ति, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता किसी पार्टी की निजी संपत्ति नहीं हैं। सत्ता परिवर्तन यदि इन सवालों के जवाब खोजने का अवसर बनता है तो वह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत होगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता मालिक है, सरकार उसकी प्रतिनिधि और सत्ता केवल एक अमानत। और अमानत का हिसाब मांगना बगावत नहीं, जनता का अधिकार है।

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