-५४ महीनों में १३,९२८ आत्महत्याएं, सरकार के पास जिलों का हिसाब नहीं?
-आरटीआई से सामने आई कृषि संकट की भयावह तस्वीर; ८,९४५ परिवार सहायता के पात्र, ४,०४२ मामलों को बताया अपात्र
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में किसानों की खुशहाली के सरकारी दावों के बीच आत्महत्याओं का भयावह आंकड़ा सामने आया है। जनवरी २०२२ से जून २०२६ के बीच राज्य में १३,९२८ किसान आत्महत्याएं दर्ज हुर्इं। यानी औसतन हर दिन आठ से अधिक किसानों की जिंदगी समाप्त हो गई। यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए विवरण से सामने आई है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इनमें ८,९४५ मामलों को सरकारी आर्थिक सहायता के लिए पात्र पाया गया, जबकि ४,०४२ मामलों को अपात्र ठहराया गया। शेष ९४१ मामलों की स्थिति भी स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। आरटीआई कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे ने आरोप लगाया है कि संबंधित विभाग ने किसान आत्महत्याओं के जिलावार आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए। ऐसे में यह जानना मुश्किल है कि किन जिलों में संकट सबसे गंभीर है और किन क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे रही हैं।
मौत के बाद भी सहायता के लिए पात्रता की परीक्षा
किसान की मृत्यु के बाद परिवार को सरकारी राहत मिलेगी या नहीं, इसका निर्णय निर्धारित नियमों और जांच के आधार पर होता है। लेकिन हजारों मामलों को अपात्र घोषित किया जाना एक बड़ा सामाजिक सवाल खड़ा करता है। क्या इन परिवारों के पुनर्वास की कोई वैकल्पिक व्यवस्था है? कृषि कर्ज, फसल नुकसान, उत्पादन लागत, बाजार भाव और व्यक्तिगत परिस्थितियां किसानों के आर्थिक संकट को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि प्रत्येक आत्महत्या को केवल कर्ज का परिणाम बताना उचित नहीं होगा। राज्य सरकार को जिलावार आंकड़े, अपात्रता के कारण और लंबित मामलों की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही आत्महत्या रोकने के लिए अपनाए गए उपायों और उनके परिणामों का मूल्यांकन भी जरूरी है। सवाल केवल १३,९२८ मौतों का नहीं है; सवाल यह है कि इतने किसानों को खोने के बाद भी क्या सरकार ने अगली त्रासदी रोकने का कोई कारगर रास्ता खोजा है?
